जय गणतंत्र
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जीते जी अपमान किया
मरने पे सम्मान दिया
भारती तेरे खातिर मैंने
अपना जीवन कुर्बान किया।
दोष मेरा बस इतना था
चाणक्य जमीं पर जन्मा था
बुद्ध किरण से होकर प्रेरित
आइंस्टीन को मात दिया।
तेरी नजरों में मैं पागल था
तुझे नहीं पता मैं घायल था
तेरी ही अनपढ़ संतानों ने
निज स्वार्थ हेतु था दगा दिया।
सात समंदर पार गया
तूने समझा सब भार गया
मैंने भी पर प्रण ठानी थी
अपनी ही मिट्टी में तज प्राण दिया।
मेरे मृत देह से भी न तुमने नेह किया
कुछ क्षण को भी न टिकने को गेह दिया
लावारिस सा सड़क किनारे पड़ा रहा
तेरे नालायक बेटों ने कहाँ एंबुलेंस का दान दिया।।
कर विदा मुझको तुम हो गये स्वतंत्र
मैं भी न रहा अब परतंत्र
सब मिल गाओ जय गणतंत्र
खुश रहो सब आज मेरा मान किया
मुझको भी पद्मविभूषण दान दिया।।
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सूबे बिहार की धरती के अमर्त्यपुत्र पद्मविभूषण वसिष्ठ नारायण सिंह को समर्पित।💐💐💐💐💐💐💐💐💐
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@**********पद्मनाभ।
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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