क्या बताऊँ
एक दिन वो दिख गई सामने
प्यार का पौध लहराने लगा मन में
मैंने कहा आ जाओ
दिल एक मंदिर है टेक दो मथ्थे
वो बोली
जरूर आऊँगी रूक जा मन तो बना लूँ पहले
वो आई भी
देखकर दिल में लड्डू फूटे
मन ने कहा गुरु अब तो तेरे दुःख के दिन छूटे
दरवाजे पर देख कर खड़ा
मेरे मुँह से निकल पड़ा
बाहर क्यों हो खड़ी
अंदर आ जाओ मन में जल रही है फुलझड़ी
वो बोली
थोड़ी सब्र तो कर
इतनी जल्दी तू ना मर
दिल तेरा मंदिर है
मंदिर में होते हैं देवता
तूने दर्शन का दिया नेवता
सुनकर मुझे तसल्ली तो मिली
फिर बोली हँसकर
मैं बेढंगी थोड़े हूँ
मुझे पता है मंदिर जाने का ढंग
और फिर उसने तो
अपनी चप्पल उतार ली।।
@**********पद्मनाभ।
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