Skip to main content

Posts

आखिर मैं कहाँ हूँ?

आखिर मैं कहाँ हूँ? **************** सम्पूर्ण बंदी का एक लंबा दौर।छोटे मँझले बड़े सभी शिक्षण संस्थान बंद।बड़े मँझोले छोटे सभी कारोबार ठप।सरकारी गैर सरकारी सभी प्रतिष्ठान भी बंद।हर प्रकार के धार्मिक स्थलों में भी ताले लटका दिये गये,राजनीति के मंदिर भी बंद,सभी विधायक, सांसद,मंत्री अपने अपने क्षेत्र में ही रहकर अपने ही घर से अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे।सबके सामने जीवन यापन ,परिवार के भरण पोषण की विकट समस्या। सरकारी स्तर पर समस्या का निदान....... 💐सरकारी कर्मचारियों का वेतन भुगतान नियमित होता रहेगा। 💐मजदूरों को राशन के साथ नगद राशि प्रदान करने का प्रावधान। 💐सभी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों को पूर्व से निर्धारित वेतन भत्तों में पहले वृद्धि फिर कुछ कटौती कर ससमय राशि का भुगतान। ध्यातव्य......... समाज के शेष तबकों में दो विशेष तबके मंदिरों के वे पुजारी या दैनिक पूजन व्यवस्था में संलग्न ब्राह्मण जिनका आधार सिर्फ मंदिरों में आये दर्शनार्थियों या अपने यजमानों के कल्याणार्थ अनुष्ठान से प्राप्त आय ही था।इसी से उनका एवं उनके आश्रितों का भरण पोषण हुआ करता था।आज सम्पूर्ण बंदी में इनकी आय भी बंद और...

बग्ला साधना।

मां बगलामुखी परिचय एवं साधना नियम । पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। कई लोग संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए।  इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव ने कहा शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया।  उस समय रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका...

आत्मचिंतन।

आत्मचिन्तन *********** सामाजिकी बड़ा ही दुस्कर कार्य है।इसमे सर्व प्रथम मैं का त्याग और हम को स्वीकार करना  परमावश्यक है।इसमे प्रताड़ना,अवहेलना,आलोचना,असहयोग,अवज्ञा रूपी आभूषणों से सुसज्जित होना अनिवार्य है। शायद यही कारण रहा होगा जब गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर को एकला चालो रे का सिद्धांत प्रतिपादित करना पड़ा होगा।आखिर गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी स्वान्तः सुखाय को ही मान्यता प्रदान की।शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद आदि ने भी तो अकेले ही के दम पर सम्पूर्ण विश्व को भारतीय संस्कृति का लोहा मनवाया।लेकिन इसका मतलब स्वयम्भू होने से नहीं है।विचार विनिमय को भी प्रधानता दी गई है।व्यष्टि और समष्टि में अंतर तो है।किसी के व्यक्तिगत विचार समष्टिगत तभी हो सकते हैं जब उसे वैभिन्यता के मध्य विचारविनिमय की कसौटी पर कस कर खरा उतारा जाय।यदि ऐसा नहीं होता तो वही ढाक के तीन पात वाली लोकोक्ति चरितार्थ होगी। आपकी यदि समाज से अपेक्षा है तो समाज की भी आपसे अपेक्षा रहती है।दोनों की अपेक्षाओं का पूर्ण होना ही सापेक्ष वातावरण के निर्माण मे सहायक होने की संभावना प्रबल करेगा।वैसे तो यह भारत है।महाभारत भी यहीं हुआ था।स...

चरणामृत।

"चरणामृत और पंचामृत में क्या अंतर है..??" 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 मंदिर में या फिर घर/मंदिर  पर जब भी कोई पूजन होती है, तो चरणामृत या पंचामृत दिया हैं। मगर हम में से ऐसे कई लोग इसकी  महिमा और इसके बनने की प्रक्रिया को नहीं जानते होंगे। चरणामृत का अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ पांच अमृत यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना। दोनों को ही पीने से व्यक्ति के भीतर जहां सकारात्मक भावों की उत्पत्ति होती है,  वहीं यह सेहत से जुड़ा मामला भी है। 👉चरणामृत क्या है.??  〰〰🌼🌼〰〰 शास्त्रों में कहा गया है - अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।। अर्थात : भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है। यह औषधि के समान है। जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। कैसे बनता चरणामृत..??  〰〰🌼〰〰🌼〰〰 तांबे के बर्तन में चरणामृत रूपी जल रखने से उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं। चरणामृत में तुलसी पत्ता, तिल और दूसरे औषधीय तत्व मिले होते हैं। मंदिर या घर में हमेशा तांबे के लोटे में तुलसी म...

दानंदुर्गतिनाशनम्।

दानं दुर्गति नाशनम्। ................................. शास्त्र बताते हैं दान से दुर्गति का नाश होता है।शायद इसलिए आज दान करना कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण लग रहा है।जिधर भी नजर जाती है दान के ही चर्चे सुनने और देखने में आ रहे हैं।टीवी,अखवार ,सादृश्यचलभाष हो या टोला टाटी,आस पड़ोस ,स्त्री पुरुष सब के सब आजकल दान की ही चर्चा म़े मशगूल दिखते हैं।ऐसा लग रहा है मानो सब एक साथ ही इसी कोरोनाकाल में दुर्गतिमुक्त हो जाना चाह रहे हैं।संभव है कोरोना से मरने का भय भी सता रहा हो।शायद इस कारण भी लोग इसी जनम में दुर्गतिमुक्त हो जाना चाह रहे हों ताकि अगला जनम शायद सुधर जाय।फिर कोरोना या इस जैसी अन्य कोई विपदा नहीं सतावे।खैर जो भी हो दान की महत्ता जब शास्त्र सम्मत है तो अवश्य करना चाहिये।लेकिन हमने दान किया या नहीं इसका प्रमाण मेरे नहीं रहने पर या भगवान चित्रगुप्त के किसी दूत के द्वारा जाँच किये जाने पर प्रमाण स्वरूप उपस्थित किया जा सके यह भी आवश्यक है।आज सब जगह प्रमाण माँगा जा रहा है तो संभव है देवलोक में भी दुर्गतिनाश के लिये प्रमाण माँगा जाये ! ऐसे में यह भी आवश्यक ही है कि जाँच पदाधिकारी स्वरूप देव के सम...

मैंने मैं को।

आज सच में मैंने मैं के हाँथों सौंप दिया अपने आपको और कोई चारा भी तो नहीं बहुत मारे हाँथ  पाँव भी चलाये पर सब व्यर्थ निरर्थक परेशानी का सबब ही रहा तन मन मिजाज बुद्धि बल सब लगाकर देख लिया कुछ काम न आया आज इतमिनान हो गया मैं मैं को सौंपकर आक्रांत रहा करता था  भय से क्या होगा  कैसे होगा कब होगा सोंच लिया अब जो होगा जैसे होगा जब होगा  तैसे होगा जो होगा सब अच्छा ही होगा प्रसन्न हूँ तब जब मैंने सौंप दिया मैं को मैं खुला आसमान स्वच्छ हवायें नदी की निर्मल धार हरे भरे वृक्ष गुल्म लतायें हँसती खिलखिलाती शोर मचाती गौरैयों के झुंड कबूतरों की गुटर गूँ कौओं के काँव काँव कोयल की कुहु सुन सकता हूँ आज सुबह शाम दिनरात तब जब मैंने सौंप दिया  मैं को मैं के हाथ चिरशांति की होती है  अनुभूति तब जब लगाता हूँ ध्यान साफ साफ सुनता हूँ मुरली की मधुर तान देख पाता हूँ मधुर मुस्कान की मुद्रा सिंहवाहिनी के खड्ग खप्पर करधारिणी मुंडमालिनी काल की संहारिणी महाकालसंगिनी कालिका के कल्याणमयी स्लरूप को प्रत्यक्ष समक्ष तब जब सौंप दिया मैने मैं को।। ..........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

ईश्वर का अवतार भारत मे ही क्यों।

*सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर* आजकल एक वामपंथी लेख बहुत प्रचारित हो रहा है, जिसमें कुछ प्रश्न (आक्षेप) किये गए हैं। धर्मविरोधी जन ये प्रश्न करते तो हैं किंतु कभी स्वयं उसका उत्तर नहीं खोजना चाहते। इसका कारण यह है कि इनमें जिज्ञासा अथवा ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं होती है, मात्र विवाद के आधार पर अपना अस्तित्व दृढ़ करने का निरर्थक प्रयास करते हैं। वैसे तो इनमें से अधिकांश प्रश्न अत्यंत ही निम्नस्तरीय हैं तथा कोई भी सामान्य अध्ययन वाला व्यक्ति इनका उत्तर अत्यंत सरलता से दे सकता है, किन्तु मैं अपनी ओर से कुछ शास्त्रीय आलोक में इनका समाधान कर रहा हूँ - प्रश्न ०१ - सभी देवी देवताओं ने भारत में ही जन्म क्यों लिया? क्यों किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोई नहीं जानता ? उत्तर ०१ - सर्वप्रथम तो यह गलती सुधारें कि देवताओं ने जन्म लिया है। उनका जन्म लौकिक नहीं होता इसीलिए वे अवतार लेते हैं, जन्म नहीं। जहां उनके जन्म की चर्चा आयी है वहां अवतार का ही अर्थ समझना चाहिए। साथ ही, असंख्यात देवताओं में सभी अवतार नहीं लेते, कुछ देवता ही अवतार ग्रहण करके लोककल्याण का कार्य सम्पादित करते हैं...