पिता ही वह हस्ती है
जिसके सा़ये में जीवन
करता मस्ती है.
स्वच्छंद निर्द्वंद आनंद के पल
छिन जाते हैं तब जब पिता का
साया साथ नहीं होता.
जाड़ा गर्मी हो या कि बरसात
सुबह दोपहर या कि घनेरी रात
पिता के रहते सर पे हाँथ.
निश्चिंत निर्भय निर्विकार
करने को साकार चल पड़ते हैं
स्वप्नलोक की अनंत यात्रा पर.
@*****पद्मनाभ
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