अक्षर हो मेरी कविता की
शब्दों में अब ढल जाओ।
तन की दूरी ठीक सही पर
ह्रदयाङ्गन मे बस जाओ।।
कुसुम बाग की तु मेरी बन
अली सरीखा मैं बन जाऊँ।
अधर सुधा रस पान करूँ
उन्मुक्त गगन फिर उड़ जाऊँ।।
रीत स्नेह का नहीं पता
प्रतिपल नेह लगा जाओ।
निद्रा निमग्न जब हो जाऊँ
स्वप्न परी बन आ जाओ।।
प्राची किरणो़ं के पूर्व प्रिये
आने के तुम जाना ना।
स्वाति बूँद की आश लिये
चातक सा प्यास बढ़ा जाना।।
...मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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