चक्षुरोगनिवारणार्थःएक प्रयोग
नेत्ररोग-निवारण हेतु एक अद्भुत यन्त्र है- सिद्ध बत्तीसा यन्त्र । ये एक सम यन्त्र है, जो वांछाकृतार्द्धा सूत्र से बना होने के कारण अपने आपमें रामबाण है । यन्त्र शास्त्र में उक्त सूत्र का विशद वर्णन है, जिसके आधार पर सभी सम यन्त्रों का निर्माण बड़ी सहजता से हो जाता है । आवश्यकता होती है- जीवन में सिर्फ एक बार इस सूत्र को साध लेने की और फिर निर्माण के समय किसी यन्त्र विशेष की साधना । साधक की व्यक्तिगत साधना पर ही यन्त्र का लाभालाभ निर्भर है । ऐसा नहीं , जैसा कि आजकल फैशन चल पड़ा है- तांबे-पीतल और यहां तक कि प्लास्टिक और कागज पर छपे-बने विविध यन्त्र बाजार में उपलब्ध हैं और उसे हम खरीद कर घर में रख देते हैं और उतने से ही आशा करने लगते हैं कि हमारी मनोवांछा पूरी हो जायेगी, कार्यसिद्ध हो जायेगा । सच पूछें तो वो सभी बिलकुल निष्प्राण यन्त्र हैं । उसे बनाने और बेचने वाले को भले ही कुछ आर्थिक लाभ हो जाये, घर में रखने वाले के लिए एक शो पीस से रत्ती भर भी ज्यादा नहीं । किसी भी यन्त्र को लेखन (निर्माण) के पश्चात् विहित विधि से साधने (चैतन्य करने) की आवश्यकता होती है । फिर उसके रख-रखाव और परिवेश का भी ध्यान रखना होता है । यानी देश-काल-पात्र का निष्पक्ष-निःस्वार्थ विचार करना होता है । इसके विपर्यय से परिणाम भी विपरीत होना स्वाभाविक है । हमारा यन्त्र-विज्ञान अद्भुत है , जिसके गहन अध्ययन, मनन और साधना की आवश्यकता है । अस्तु ।
इस बत्तीसा यन्त्र का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है । ज्ञातव्य है कि सांख्यानुसार दृष्टि का सम्बन्ध रुप तन्मात्रा से है, जो अग्नितत्व से निबद्ध है और अग्नि का सम्बन्ध सूर्य से है । दृष्टिदोष यानी चक्षुरोगों में सूर्य की आराधना और सूर्य सम्बन्धी उपचार बहुत ही कारगर हैं । उपनिषदों में सुख्यात है- चाक्षुषोपनिषद् , जिसे चाक्षुषीविद्या के नाम से भी जाना जाता है । शिष्य उपमन्यु को महर्षि धौम्य ने इसे प्रदान किया था ।
उक्त यन्त्र के साथ इस चाक्षुषीविद्या का संयुक्त प्रयोग बड़ा ही आशुकारी होता है । यन्त्र साधना की दीक्षा किसी योग्य गुरु से सम्यक् ग्रहण करनी चाहिए । सूर्योपासक सूर्यांश मगविप्र इसके सिद्ध कहे गए हैं । आज भी ऐसे बहुत से साधक हैं, जो लोककल्याण के पुनीत कार्य में संलग्न हैं ।
यन्त्रविधि— कांसे की तस्तरी में हरिद्रावलेह से दाडिम लेखनी द्वारा इस यन्त्र का लेखन करना चाहिए । तत्पश्चात् तांबे के चौमुख दीपक में चतुर्दिक गोघृत बर्त्तिका प्रज्ज्वलित कर स्थापित कर दे । तत्पश्चात् सूर्यमुखासीन होकर यन्त्र का पञ्चोपचार पूजन करे । तदुपरान्त अद्येत्यादि...संकल्प पूर्वक ऊँ ह्रींहंसः मम चक्षुरोगान् शमय शमय मन्त्र का छः माला जप करे- हरिद्रामालिका पर । तदुपरान्त चाक्षुषोपनिषद् की द्वादश आवृत्ति पाठ करे । पाठ के पश्चात् पुनः उक्त मन्त्र का छःमाला जप करे । और सूर्य को भक्तिभाव से अर्घ्य अर्पित करे ।
उपासना का ये प्रयोग रविवार वा सूर्य के अन्यान्य महत्त्वपूर्ण पर्वों के अवसर पर करना चाहिए । पूरे प्रयोग को लागातार चार बार अवश्य करे । व्याधि अति जटिल हो तो बारह बार करना चाहिए ।
नोटः— १. उक्त विधि से रक्तभूर्जपत्र पर यन्त्र-लेखन करके त्रिलौह (सोना-चांदी-तांबा) अथवा सिर्फ तांबे की ताबीज में भर कर चक्षुरोग पीड़ित को गले में धारण कराने का भी शास्त्र निर्देश है ।
२. मांस-मदिरासेवी पर इस यन्त्र का प्रयोग कदापि न करे । अन्यथा दोनों पक्ष का भारी अनिष्ट होगा । अस्तु ।
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