लोकस्तदनुवर्तते।
प्रत्येक श्रेष्ठ मनुष्य ही अनुकरणीय होता है।जनसामान्य उसका ही अनुकरण करते हैं।श्रेष्ठता की पहचान उसकी भाषा,बोली,भाव,समाजोपयोगी क्रियाकलाप ,वाणी की सौम्यता ,अपने से श्रेष्ठ जनों के प्रति सम्मान का भाव एवं कथनी करनी में समानता से होती है।कारण यह है कि सामाजिक जन उस श्रेष्ठ पुरुष का ही अनुकरण करते हैं।दुराग्रही,दुराचारी, दंभी,लंपट,मिथ्याभाषी, लोभी,अतिवाचाल,श्रेष्ठजनों ,विद्वानों के बीच अपनी थोथी दलील से अपनी महानता सिद्ध करने वाला ,दुराचारी, बेवजह दूसरों पर दोष मढ़नेवाला ,सामाजिक होने का स्वांग भरने वाला कभी भी सामाजिकों की दृष्टि में श्रेष्ठ की श्रेणी को प्राप्त नहीं करता।दिन रात जो अपने को महान और दूसरों को निम्नस्तरीय बताने की कोशिश में लगा रहता हो उसे कभी भी समाज श्रेष्ठता की श्रेणी में स्वीकार नहीं कर सकता।अतः स्पष्ट है कि श्रेष्ठता की श्रेणी में स्थान पाने के लिये हमें सदैव विनम्र,दंभहीन,सौम्यभाषी,क्रियाशील, सन्मार्गी, बोधगम्यतादि जैसे आचरणो से युक्त होना होगा।हमारे शास्त्रों में निहित तत्वों को समझकर यथासाध्य अपने व्यवहार में लाना होगा।योगीराज श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में इस हेतु अपने प्रिय सखा अर्जुन को उपदेशित करते हुये इस आशय का संकेत देते कहा.....
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थात् महान या श्रेष्ठ की श्रेणी को प्राप्त करने की इच्छा करने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह शास्त्र की मर्यादा का सदैव ध्यान रखे।उसके द्वारा व्यवहार में ,आचरण में,विचार में,लेखन में या वाचन में अथवा उसके किसी भी क्रियाकलाप में लोक या शास्त्र की मर्यादा कदापि भंग न हो।यदि इन गुणों को हम अपने भीतर समाविष्ट कर लें तो तो समाज या राष्ट्र हर स्थान पर श्रेष्ठों की श्रेणी में हम सम्मान पाने के अधिकारी अवश्य होंगे।ऐसे आचरण से विमुख होने पर व्यक्तिगत तो हमें हानी का सामना करना ही पड़ेगा साथ ही समाज या राष्ट्र भी इस हानि से वंचित नहीं रह पायेगा।आगे इसे स्पष्ट करते हुये पुनः जगदाधार ने कहा...
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तंते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।
.....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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