आ गेलै फागुन महिनमा
होअब जिआ धड़के मोरा।
लाल लाल टेशु के फुलवा फुलयलै
खेतवा में सगरे सरसो गंधैलै
बूट साथे मटरो के दाना गदरैलै
झूम झूम अलसी लेलक परनमा
हो अब जिआ धड़के मोरा।
भोरे भोरे काँपे ला थर थर देहिया
होते दुपहरी जगावे धूप नेहिया
साँझे के आलस लावे ला पछिया
रात के सतावे ला पिया के सपनमा
हो अब जिआ धड़के मोरा।
सास ननदिया मार हयी ताना
गोतनी न छोड़ हयी आँख देखाना
भैंसुर ससुर भी खोज हयी बहाना
देवरा भी ढूँढ़ हयी मिले के बहनमा
हो अब जिआ धड़के मोरा।
राते सेजरिया सूना लागे
रहे रहे निंदिया रोजे जगावे
निर्मोही के पतियो न आवे
कस मस करे बदनमा हो
अब जिआ धड़के मोरा।
आ गेलै फागुन महिनमा हो
अब जिआ धड़के मोरा।
.....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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