एक संतरास पत्थर के
टुकड़े को तरास कर
शिव बना देता है
जो कभी किसी का सर
फोड़ते थे
एक खरीददार उस शिव के अंदर
नक्काशी की बारीकियाँ तलाश
मोल भाव करता है
जिसने कभी उस पत्थर से
किसी का सर फोड़ा था
अंतर बस तलाश की है
संतरास को पत्थर में तलाश थी
शिव की
वो मिल गये।
.....मनोज कुमार मिश्र '"पद्मनाभ"।
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