निद्रा समाधिस्थितिः।
*********************
निद्रा !अर्थात् नींद,शयन की अवस्था।
साधारणतया निद्रा शब्द से यही सामान्य अर्थ निकलता है।किन्तु जब गूढार्थ की ओर दृष्टिपात करते हैं तो बात कुछ और ही निकलकर आती है।निद्रा का तात्पर्य मात्र शयन अथवा पूर्ण विश्राम नहीं अपितु निद्रा तो पूर्ण समाधि की वह अवस्था है जहाँ आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है।
"आत्मा त्वं गिरिजा मतिः"।विभिन्न आचार्यों के मतानुसार निद्रा ही भक्ति है।इस अवस्था में शरीर रूपी गेह में प्राण सहचर की भूमिका में होता है।"सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं"।पूजा तो विषयोपभोग की रचना मात्र है।"पूजा ते विषयोपभोग रचना"।इसलिये निद्रा रूप समाधि की प्राप्ति हेतु यह आवश्यक है कि जिस क्षण निद्रा के आने की संभावना हो तत्क्षण भगवन्नाम का जप आरंभ कर निद्रा के आने तक निरंतर यदि मनसा नाम जप चलते रहे तो जाग्रतावस्था की समाप्ति और सुखद निद्राप्राप्ति शीघ्र ही संभव है।ज्यों ज्यों हम भगवन्नाम का स्मरण करते हैं शनैःशनैःहमारा संबंध संसार से छूटता जाता है।यही वह अवस्था होती है जब हम जाग्रतावस्था को पूर्णतया समाप्त कर पाते हैं।यह जाग्रतावस्था की समाप्ति और पूर्ण विश्रामावस्था की प्राप्ति के मध्य का संधिकाल ही हमें भगवन्नाम के सहारे पूर्ण समाधि मे तल्लीन कर पाता है।इसलिये यह आवश्यक है कि इस काल को हम भगवन्नाम से जोड़कर चलें।पुनः जाग्रतावस्था की प्राप्ति का जब काल आये तब भी भगवन्नाम का ही स्मरण हो तो हम कभी भी भक्ति से विमुख हो ही नहीं सकते।निद्रावस्था अर्थात् पूर्ण समाधि की अवस्था ही हमें उस परम तत्व तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
🙏🙏👌👌💥💥
ReplyDelete