भूख की आग
जलाकर कर देती है राख
सियासत दाँ हों या खासोआम
कर देती है सबका चक्का जाम
इस एक सवाल पर सब साधें मौन
ओहदेदारों को समझाये कौन
आते ही त्योहारों के मौसम
फहराने लगते हैं महामारी के परचम
चुनाव की वेला में
दलों के रैला में
महामारी पड़ जाती सुस्त
आम अवाम से सियासतदान तक
हो जाते भले चंगे दुरुस्त।।
....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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