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ताड़ो।

ताड़ो
ढोल की ताल 
हल्की सी थाप देकर
सुर के साथ है कि नहीं
पीटोगे तो टूट जायेगा
समझो
गँवार को 
उसकी भाषा से
बेवजह उलझना ठीक नहीं
इसे भी जानने का प्रयास करो
जन्मना जायते शूद्रः
संस्कारात् द्विज उच्यते
वह अछूत नहीं है
सुसंस्कृत बनाकर तो देखो
पशु भी प्राणी है 
पर मूक
जानने की कला सीखनी होगी
उसको भी अपने अनुकूल
बनाना होगा फिर तो
जंगल का राजा भी 
आपका आदेश पालक होगा
नारी तो आपकी सहधर्मिणी है
सहकर्मिणी है सहगामिनी है
स्वाभिमानिनी अनुगामिनी
मानिनी है सहचरी
आवश्यकता  तो पढ़ने की है
मनोभाव को ताड़ने की 
पीटने की नहीं
शब्द तो शबद है
गहरे पैठोगे तभी समझ पाओगे 
अर्थ को वर्ना बेवजह
शोर मचाओगे
अर्थ का अनर्थ कर समाज को
बरगलाओगे
अपनी ही भद्द पिटवाओगे।।
....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

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