सुना था
नदी की धार के साथ
छोड़ दो अपनी देह
स्वतः बहते चले जाओगे
नियंत्रण रखो सिर्फ स्वांस पर
गंतव्य तक स्वतः बहा ले जायेगी
धार अपने आप
करके देख लिया
इस अनूठे प्रयोग को
बाधाएँ आयीं
चट्टानों से टकराना पड़ा
कुछ घाव भी हुये
लेकिन अंततः मंजिल मिल गई
विश्वास नहीं हो रहा
अब भी असमंजस में हूँ
यह सत्य है या दिवा स्वप्न।।
....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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