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गुलाब की पंखुड़ी।

गुलाब की वह पंखुड़ी
आज भी सहेज कर रखा है
किताब के पन्नों के बीच
जिसे वर्षों पहले तुमने दिया था
जब पहली बार मिले थे 
हम तुम दरिया के तीर पर
बरकरार है आज भी 
तुम्हारे कोमल हाँथों का स्पर्श
भीनी भीनी महक तुम्हारे संस्पर्श की
इसीलिये इतने दिन बाद तक भी 
संभाल कर रखा हूँ उस एक किताब को
तुम्हारी लिखी वह चिट्ठी भी 
महफूज है अपने हरेक हर्फ के साथ
जता रहा है आज भी उस 
प्रथम प्रणय निवेदन को
जो तुमने अपने लहु से लिखकर जताया था
उसी किताब के पन्नो के बीच
अब कहाँ कुछ सुरक्षित रख पाता हूँ
ह्वाट्स एप के चक्कर में
डर लगता है कहीं मोबाईल हैंग न कर जाये
पढ़ते डिलीट का बटन दबा देता हूँ
कलम पकड़े अरसा गुजर गया
कागज का गत्ता कब खरीदा था
कुछ याद ही नहीं
जरूरत भी नहीं पड़ती
सबकुछ तो मोबाईल में उपलब्ध है
इधर किताबें भी तो नहीं खरीदी कोई नयी
जब जरूरत पड़ी गूगल बाबा से माँग लेता हूँ
बड़े उदार हैं दे देते हैं
सहज भाव से क्षण मात्र में
बस पढ़ने भर के लिये।।

.....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

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