पता नहीं कब
कहाँ कौन
काम आ जाये
कह नहीं सकता।
अब तो
कभी किसी को
कुछ करने से
रोक नहीं सकता।
देखिये न
एक तिनका
छोटा सा जिसका
कोई वजूद नहीं।
लेकिन
उड़कर अगर पड़ जाये
आँखों में
दर्द होने से कोई
रोक नहीं सकता।
कल तक
मोबाईल बच्चों के
बिगड़ने का साधन
हुआ करता था।
तब
हम छीन लेते थे
बच्चों के हाथ से
मोबाईल वह रोता
रह जाता था।
डर था
आँखों की
रोशनी न गुम
हो जाये कहीं।
पर आज
अहले सुबह से
देर शाम तक
कक्षाएँ संचालित हो रही हैं
मोबाईल पर।
नर्सरी से
एम.ए .तक
मास्टरी से डाक्टरी तक
वकालत से इंजीनियरिंग तक।
माध्यम है मोबाईल
शिक्षा का
ज्ञानार्जन का
जीवन के
परिमार्जन का।
अब आँखें खराब नहीं होंगी
फरमान है
आलाकमान का
राष्ट्र के शीर्ष विद्वान का।
कर लो तैयारी
भविष्य की
आपका चश्मा तो उतर गया
इन नर्सरी के नौनिहालों को
लगने वाला है मोटा सीसा जल्द ही।
आँख के डाक्टर बैठे हैं
तैयार साजो सामान लेकर
कर रहे हैं इंतजार
बच्चे के साथ
आपके आने का।
कोरोना तो चला जायेगा
लेकिन बच्चों के आँख की
रोशनी कौन लौटायेगा?
.......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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