अजीब विडंबना है
तुम हमेशा साथ रहती हो
जन्म से मरण तक
साये की तरह
फिर भी पहचान छुपी ही
रह जाती है
नजर रखती हो तुम
मेरी हर क्रिया कलाप पर
शीत घाम वर्षा में
साथ रहते बीत जाता है अरसा
फिर भी पहचान छुपी की छुपी
न रूप न रस न गंध
पर बना रहता है सदैव
हमारा संबंध
जन्म के साथ ही हो जाता है
यह अनुबंध
नीति नियति के आधार पर
कर नहीं पाते पर कभी हम
तुम्हारी बंदगी
ऐ जिंदगी।।
..............मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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