Skip to main content

एकं सद् बहुस्याम।

*#ईश्वर_एक_नाम_अनेक_कैसे*

*#हिन्दू_रहस्य_भाग ::-1*

मैं आपको हिन्दू धर्म के रहस्य के बारे बताने जा रहा हूँ , जैसा कि आप जानते हैं हिन्दू धर्म मे तैतीस करोड़ देवता है , या कह सकते अगणित ,करोड़ो देवता है । 
 
जितने भी तारे , नक्षत्र , नदी , पहाड़ , तीर्थ , तीर्थ के देवी देवता है सब करोड़ो देवता के अंतर्गत आते है।। शिव , शिव के रुद्र , शिव के गण , इस प्रकार एक ही देवता के अनेक अवतार, अनेक नाम  है देश-काल के अनुसार एक ही देवता का नाम रूप बदलते रहते है।

लेकिन करोड़ो देवता होते हुए भी श्री वेदभगवान  , श्री उपनिषदजी  , श्री गीता जी , श्री गुरू ग्रन्थ जी । इत्यादि हमारे धर्म ग्रन्थ में ईश्वर को एक कहा गया है। एको अहम द्वितीयो नास्ति ।
मैं एक हूँ , दूसरा नही ।

अब मैं आपको ईश्वर का वास्तविक नाम बताता हूँ , उसका नाम ॐ है।
जब सृष्टि का रचना होता है तब यही ध्वनि प्रथम बार उच्चारण होता है , सदैव उच्चारण ॐ की होता रहता है , वैज्ञानिक ने सूर्य का जो ध्वनि प्रस्तुत किया वो ॐ जैसा प्रतीत होता है , कोई रहस्य तो ॐ मे जरूर है ।योगी लोग भी ध्यान में ॐ का अन्तः उच्चारण करते है जिसे नाद कहते है। धर्म ग्रन्थ में इसको प्रणव कहते है यह तीन वर्ण से बना हुआ है ,अ, उ, म,  जिसका अर्थ है ब्रह्मा , विष्णु , महेश , सृष्टि कर्ता , पालन कर्ता , संहार कर्ता । ॐ हमारे करोड़ो देवता के संघनात्मक नाम है ,
इसलिए श्री गुरू नानक प्रभु जी कहते है एक ओंकार सतनाम (एक ॐ ही सत्य नाम है)

उपनिषद मे ओमिति ब्रह्म  (ॐ ब्रह्म है )

जिस प्रकार प्रकाश का रंग मात्र एक  श्वेत है परन्तु तीन मूल रंग  लाल, हरा, नीला के कारण संसार मे विभिन्न रंग उपस्थित है।

उसी प्रकार योगी जन अपने ध्यान योग के द्वारा ब्रह्मण्ड में सत् , रज् ,तम् तीन मूल गुणों के उपस्थित शक्ति का नाम अनेक नाम -रूप किया । इसी कारण विभिन्न गुणों के अनुसार उनकी विभिन्न उपासना होती है  ।
देश काल परस्थितियों के अनुसार  उपासक का भोजन , वस्त्र , रहन सहन अलग अलग होता है जिसे सम्प्रदाय कहते है।

इसी कारण  भगवान वेद मे एक श्लोक है एकोहं बहुस्याम

ब्रह्म एक है अनेक नामों से जाने जाते है ।

जैसे मैने पहले बताया हूँ ॐ ईश्वर का एक मात्र नाम है ।

ॐ गणेशाय नमः ।

हे ईश्वर मैं गणेश रूप में ध्यान करता हूँ।

ॐ दुर्गा देव्यै नमः।

हे ईश्वर मैं दुर्गा देवी रूप में ध्यान करता हूँ।

तातपर्य है ईश्वर एक है नाम अनेक है ।
#लेखक_आचार्य_अनन्त_कृष्ण

*#माँ_बगलामुखी_तंत्र_ज्योतिष*
आचार्य अनन्त कृष्ण
Maranpur Gaya
8271525098

Comments

Popular posts from this blog

रावण का काम तमाम।

रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

टोटके।

*🥦तांत्रोत्क वनस्पति टोटके🥦* 🕉️🏹🚩🔔🐚📿🔱 छोटे-छोटे उपाय हर unघर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं।हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है। यहां कुछ ऐसे ही सहज और सरल उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है, जिन्हें अपना कर पाठकगण लाभ उठा सकते हैं। ♦बिल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है। ♦अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे। ♦नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा। ♦संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे। ♦आक की जड़ :...

कैसे उसे बुलाऊँ मैं

नयनो से हैं रूठी नीदें सपन कहाँ सजाऊँ मैं। दूर हो गइ रूह जिगर से वापस  कैसे  लाऊँ  मैं। सूख गये आँसू आँखों के कैसे  धार   बहाऊँ   मैं। सुनने वाला पास नहीं जब हालेदिल किसे सुनाऊँ मैं। बाती है पर स्नेह नहीं जब फिर कैसे दीप जलाऊँ मैं। रिसते हों जब जख्म ह्रदय में मरहम   कहाँ  लगाऊँ   मैं। हार गया हूँ तनहा रहकर कैसे   उसे   बुलाऊँ   मैं। फूलों की खुशबु जब आती दिल  को  कहाँ  सजाऊँ  मैं। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"