जाने को जहाँ से
बेसहारा न था
चार कंधों का मिलता
सहारा जो था
हाय री किस्मत तुझे
मेरी ये खुशी सहन न हुई
अब तो जानेवालों को भी
जहाँ में चार कंधे मयस्सर नहीं।
पढ़ फातेया या कलमा
अरदास गुरु की करके सही
ले नाम गौड का धुन
सत्यनाम राम का
सुनना भी स्वप्नवत् हुआ
न मिट्टी मिली देश की
न आग का गोला दिखा
तर्पण को जल भी न मिला जहाँ में
गंगा का दर्शन भी दूभर हुआ।
सुना था भला है मरना
विदेश मे
जहां अपना कोई नहीं
खायेंगे जानवर मिट्टी को
मनेगा महोत्सव पर हाय!
इसे भी छीन लिया
प्रकृति ने।।
💐💐@मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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