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मेरे सारे पाप धुल गये
आज गंगा में डुबकी जो लगा ली
पूरे मास पावन कार्तिक में
निरामिष रहकर
सत्य की राह चलता रहा
सनातन की नगरी में
हाँथ डालकर देख लो भीतर तक
कुछ भी शेष नहीं तन की गगरी में
मन वचन कर्म सब हो गये शुद्ध
मैं हो गया पूर्णतया प्रबुद्ध
आखिर डुबकी जो लगा ली
परम पावन गंगा की धार में
कसम खाता हूँ आज
मैं जो कुछ कहूँगा
सब सच कहूँगा
आने वाले पंचवर्षीय दिनों
की योजना बनाऊंगा
सड़क नाली गली
बिजली पानी सब
दुरुस्त करवाऊंगा
शिक्षा स्वास्थ्य सबको
मुहैया करवाऊंगा
करता हूँ इकरार
बस अगले पाँच वर्ष के लिये
चाहिये फिर से एक बार
आपका प्यार
माँ गंगा की कसम।।
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@***********पद्मनाभ।
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