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पूजा पाठ।

पूजा पाठ।
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आज भोरहिं भोरहिं मोबाईल के घंटी बजल।सुतले हली।अंधुअयले मुँहें उठैली नंबरो न देखली केकर फोन हे।जैहहिं अपन आदत के हिसाब से हरि ओम् कैली ओने से आवाज आयल के ,बाबा,हम बोलैथियो गजोधर सुतले ह का!पहिले तो कुछ समझ में न आयल।फिर एकाबैक इयाद आयल अरे ई तो हमर बगलगीर गजेंदर जी के आवाज हे।इनका हमनी प्यार से गजोधर भाई कह ही।एने से फिर हमहूँ बोलली हाँ हाँ गजोधर भाई बोल का हाल चाल हे,कैसे कैसे इयाद कैल ई भिनसरे भिनसरे?का कोई विशेष बात हे का ,सब ठीक ठाक हौ न?ओने से गजोधर भाई ,अरे न न बाबा सब ठीक हे चिंता मत करूँ ।एगो काम हल एही से फोन कैली सबेरे सबेरे अपने के तकलीफ देली।देखली कि फिन दिन में अपनें से भेंट होयत कि तो न,हम तो जन न ही अपने के ,पूजा पाठ में निकल गेला पर कखनी आयब कोई ठेकान न रह हे।एही से सोंचली कि बाबा से एही घड़ी बतिया लेई।अच्छा बोल का बात हे।कौन काम ला फोन कैल हे गजोधर भाई।कुछ पूजा पाठ के बात हे कि आउ कुछ?न न बाबा आउ का रहत।पूजे पाठ ला कुछ बात करे के हल।अरे ऊ का हे न कि अपने तो जनबे कर ही हमर बड़का बेटा के जे दिल्ली रह हे।हाँ हाँ बोल न का होयल ओकरा सब ठीक है न?न न बाबा ऊ तो ठीके हे।ओकर एगो दोस्त है बड़ी पढ़ल लिखल ,बड़ी बड़का डागडर है ।अरे का कहब हे दिल्ली में ऊ जे बड़का अस्पतलिया है,जहाँ बड़ी दिन दिन पृर नंबर आव हे मरीज देखे ला अरे हाँ इयाद पड़ल एम्स ओही में ऊ काम कर हे।तब?अरे तब का बाबा एगो लड़की भी ओही में डगडरी कर हलै,देखे सुने में बड़ी बेस हलै।गोर नार बढ़िया हलै।ओही में दुनु मरीज देखैत देखैत एक दूसरो के देख लेलन आउ का।माने?अरे दुनु के परेम बियाह गेल बाबा।ओ अच्छा।ई तो बढ़िया बात हे।त एकरा ला तू काहे परेशान ह?न न बाबा हम परेशान काहे ला रहम।अरे ई में बात ऐसन होलै न बाबा कि दुनो मिलके एके घर में रहे लगलन।मेहारु मरद होइये गेलन त अब अलगे रहहूँ के न चही।बकि होलै का न कि लैकवा के दोसर अस्पताल म़े बदली हो गेलै।अब ओकरा तो जाय पडलै।पहिले दनु साथे हल त एके कार से अपन चल जा हल ओने से साथे चल भी आव हल।हलांकि हल दुनु दिलिये में।बकि लैकवा के तनि दूर पड़ हलै।ई लेल ऊ अपन मेहरारु से कहलक कि तोरो बदली करा देही ओनहीं।आउ उधरे एगो किराया के मकान ले लेब।ई मकान के छोड़ देब।ओने किराया भी कम लगत आउ साथे आबे जाय में भाड़ा के पैसा भी बचत।क्रमशः....।.

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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

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कैसे उसे बुलाऊँ मैं

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