पितृपक्ष विशेष.......
इस सप्ताह के बाद पितृमुक्ति का पर्व आरंभ होने जा रहा है।देश, विदेश के लाखों पुत्र अपने पूर्वजों के मुक्ति की कामना लेकर गयाजी की पुण्यभूमि को नमन करेंगे।भगवान विष्णु के पावन चरण पर अपने पूर्वजों के नाम का पिण्ड अर्पित कर उनके मोक्ष की कामना करेंगे।अपने स्मृतिशेष पूण्यात्म़ाओं के नाम लाखों लाख की भौतिक सामग्रियों का दान कर लोक मे अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने मे भी पीछे नहीं रहेंगे।लेकिन प्रश्न यह है कि क्या श्राद्ध इसी का नाम है?मैं समझता हूँ शायद नहीं।क्योंकि शास्त्रकारों ने इस संबंध मे अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है...श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।अर्थात श्रद्धापूर्वक पितरों के निमित्त जो कुछ भी अर्पण किया जाए उसे ही श्राद्ध की संग्या दी जाती है।स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति किसी भौतिक पदार्थ के दान से कदापि संभव नहीं।सूक्ष्म शरीर तमाम भौतिक उपकरणों के उपभोग से परे होता है।इसे विचारणा,चेतना, और भावना से ही प्रसन्नता होती है ।इसलिए इन्हें शान्ति प्रदान करने के लिए उत्कृष्ट भावनाओं से भरा शुद्ध अंतःकरण ही अपेक्षित है।श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य अपने पूर्वजों के प्रति नित्य निरंतर कृतग्यता अर्पित करना होना चाहिए।ईस श्रृंखला को कदापि खंडित नहीं हौने देना ही वास्तविक श्राद्ध है।ऐसा मान लेना कि गयाश्राद्ध कर हम पितृ ऋण से मुक्त हो गये यह सर्वथा अनुचित है।देव ऋण ऋषि ऋण,और पितृऋण से हम कभी मुक्त हो ही नहीं सकते।अतः पितरों की संतुष्टि के लिए सिर्फ पितृपक्ष मैं ही दान ,तर्पण या पिण्ड अर्पण कर्म मात्र ही इति श्री हो जाता,इसके लिए यह आवश्यक है कि हम सदैव उनके निमित्त श्रद्धापूर्वक दान ,तर्पण आदि क्रियाओं का संपादन करते रहे ं,उनके बताए मार्ग का अनुशरण करते रहे ं यही सच्चा श्राद्ध होगा।
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