पितरो वाक्य मिच्छन्ति भाव मिच्छन्ति देवता। अर्थात पितृगण की प्रसन्नता वाक्यों के शुद्ध उच्चारण से होती है।वहीं देवता केवल भाव मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं।किन्तु गयाश्राद्ध मे इसके विपरीत देखने को मिलता है।कर्ता तो अपनी भावना लेकर यहाँ आता है और पितृयग्य संपादन करवाने वाले आचार्य केवल अपनी जेब गरम करने का भाव ही रखते हैं ।वाक्य की शुद्धि से उनका क्या लेना।शुद्ध राशि से जेब गरम होता रहे उनका तो यही भाव मात्र रहता है।देव पूजन मे भी यही देखा जाता है।भगवान के लिए मन मे भाव हो न हो यजमान और आचार्य के मनोभाव अवश्य होने चाहिए।जो यथार्थ रूप मे आचार्य हैं जिनके वाक्य शुद्ध रूप मे उच्चरित होते हैँ उन तक पंडे पुरोहितों के द्वारा यजमानो को पहुचने नहीं दिया जाता या वैसे आचार्य यजमानो को अपने निकट आने का अवसर ही नहीं देते।ऐसी परिस्थिति मे न पितर प्रसन्न होते न देवता।मनोवांछित फल नहीं मिलने पर दोष भी इन्हें ही दिया जाता है।करे कोई भरे कोई।उपरोक्त वाक्य के आलोक मे यदि तदनुरूप कार्य सम्पादन हो तो देव और पितर दोनों ही आज इस कलिकाल मे भी मनोवांछित फल देने मे पूर्ण सक्षम हैं।इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं।
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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