भारती----भा --रति
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हे भारती के पुत्र तुम
क्यों भा--रति हो बन गये
निज शौर्य का कर त्याग
क्यों रंग रोगन कर रहे।
थी ज्ञान की गंगा बहती जहाँ
अब नृत्य नंगा हो रहा हरदम वहाँ।।
थी तान मुरली की बजती जहाँ
रास ही थी कृष्ण की लीला यहाँ
कृष्णलीला नित्य ही है हो रही
मैल मन से है नहीं पर धुल रही।।
पान जो करते सुधा का थे कभी
वे पान मधु का कर रहे हैं अभी
थे नायक महाराणा होते जहाँ
थीं गूँजती गाथायें वीरता शिवराज की।।
अब नहीं होते महानायक राणा यहाँ
नहीं गूँजती गाथायें शिवराज की
थीं नायिकायें दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती यहाँ
चलचित्र की तारिकायें नायिका कहला रहीं।।
कहे जाते कभी थे लाल धरती के मनुज
बोझ बन भूभार जीवन ढो रहे हो दनुज
हो दृष्टिहीन विलुप्त स्मृति बन अकर्मण्य
नित अभिषप्त सा जीवन जी रहे।।
@पद्मनाभ*******
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