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जीवन समर।

जीवन समर में विजयी होना है तो श्रीमद्भवद्गीता को पढ़ना ही होगा"।
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                  💐💐कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्💐💐
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हमारी भारतीय संस्कृति का उद्भव नाना पुराण निगमागम सम्मत है।तभी तो जब "राम चरित मानस"के प्रणेता संत शिरोमणि महामना गोस्वामी तुलसीदास जी से मानस रचना विषयक प्रश्न पृच्छा हुयी उन्होंने बड़ी सहज भाव में प्रत्युत्तर समर्पित करते हुये कहा"नाना पुराण निगमागम सम्मतं यत् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि"।श्रीमद्भगवद्गीता भी उसी प्रकार अपने पूर्ववर्ती या परवर्ती रचित शास्त्रों का सार समुच्चय प्रतीत होता है।चार वेद,एक सौ आठ उपनिषद, अठारह पुराण ये हमारे भारतीय संस्कृति के मूल हैं।भारतीय संस्कृति को जानना ,समझना,पहचानना, या मानना है तो इन शास्त्रीय सागरों के अंतस् में डूबना ही होगा।तभी "जिन ढूंढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ "की सार्थकता सिद्ध हो पायेगी।किन्तु इस कलिकाल के अतिव्यस्ततम क्षण में यह संभव प्रतीत नहीं होता।इसीलिये शायद कलिकाल आगमन की पूर्व संध्या पर महानायक ,महान शास्त्रज्ञ ,महाज्ञानी, महावीर गुरुणाम्गुरु श्री कृष्ण ने श्रीमद्भवद्गीता रुपी ज्ञान गंगा का प्रवहमान स्वरुप भारत के इस धराधाम पर प्रवाहित किया।अठारह अध्याय अठारह दिन में सम्पूर्ण शास्त्रों का सार।एक बानगी गीता के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक की।
"धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
  मामकाः पाण्डवाश्चैव किम् कुर्वत् संजय।।"
अब आवश्यकता इसके शब्दार्थ की नहीं गूढार्थ को समझने की है।क्योंकि अठारह दिनों के अठारह अध्याय में संकलित इस महान धर्मग्रंथ का यही सार है।जिसने इसे भलिभांति समझ लिया वही सम्पूर्ण गीता के अवगाहन का अधिकारी हो सकता है।भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल पर उपदेश कर रहे हैं।प्रथम श्रोता महान धनुर्धर अर्जुन।उपदेश धर्म का।अजीब विडंबना सी प्रतीत हो रही है।किन्तु सत्य है।युद्ध का भी अपना एक धर्म होता है।धर्म से परे युद्ध भी उचित नहीं।तभी तो श्री कृष्ण कहते हैं "क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मम् कुरु"।अर्थात् प्रति क्षेत्र धर्म का पालन करना चाहिये।अब क्षेत्र है क्या,इस संबंध में बड़ी विषद व्याख्या आगे के अध्यायों में प्रस्तुत की है।हमारा अभिप्रेत अभी वहाँ जाना नहीं है।
@पद्मनाभ*******
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