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त्वमेवमाता।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐त्वमेवमाता च पिता त्वमेव💐
💐त्वमेव बन्धुःच सखा त्वमेव💐
💐त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव💐
💐त्वमेव सर्वं मम देव देव💐💐
ईश वंदना के रूप में मानव जीवन के संबंधों को प्रदर्शित करती प्रार्थना की ये पंक्तियां सिर्फ पठनीय ही नहीं ,अवलोकनीय ही नहीं अपितु अनुकरणीय भी हैं।जीवन में संबंधों का बड़ा महत्व माना गया है।खासकर भारतीय जीवनशैली का मूलाधार संबंध ही होते हैं।इन संबंधों में गिरावट के कारण ही आज भारतीय जीवनशैली छिन्न भिन्न होने के कगार पर खड़ा दीख रहा है।यदि इससे निजात पाना चाहते हैं तो हमें उपरोक्त पंक्तियों पर गहन विचार करना होगा।इसकी सम्यक् व्याख्या करनी होगी।इसे आत्मसात करना होगा।जिस स्वच्छंदता को हम स्वतंत्रता का नाम दे स्वैराचार करने पर आमादा हैं वह आज हमें पतनोन्मुख बना रहा है।हम स्वतंत्र हैं स्वच्छंद नहीं।स्वतंत्रता कहीं भी स्वच्छंदता को प्रेरित नहीं करती।यदि ऐसा होता तो स्वतंत्र राष्ट्र के संचालन हेतु विधि सम्मत व्यवस्था नहीं बनाई जाती।इसी विधिसम्मत व्यवस्था को प्रदर्शित करता उपरोक्त मंत्र हमें रिश्तों में बंधकर जीवन जीने की कला सिखलाता है।जीवन आरंभ माता पिता के स्नेहबंधन से आरंभ होता है थोड़ा बड़ा होने पर भाई बहनों ,सगे संबंधियों एवं इष्टमित्रों के संग रहकर व्यवहार कुशलता संबंधी आचरण की सीख देता है उसके बाद किशोरावस्था आने पर विद्या अर्जन अर्थात् ज्ञानार्जन को प्रेरित करता है।ज्ञानार्जन करने के उपरांत युवावस्था में प्रवेश पाते ही क्रमशः ऊपर के सभी संबंध वार्धक्य को प्राप्त होने लगते हैं ऐसे में उनके एवम् शेष भावी जीवन के संवर्द्धन एवं संपोषण हेतु धन की महती आवश्यकता होती है अतः हमें द्रव्याधीन होने की प्रेरणा देता है।इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उपरोक्त श्लोक मात्र प्रार्थना का मंत्र नहीं अपितु जीवन के सुचारू संचालन का मूल म़ंत्र है।
@पद्मनाभ*******
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

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*🥦तांत्रोत्क वनस्पति टोटके🥦* 🕉️🏹🚩🔔🐚📿🔱 छोटे-छोटे उपाय हर unघर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं।हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है। यहां कुछ ऐसे ही सहज और सरल उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है, जिन्हें अपना कर पाठकगण लाभ उठा सकते हैं। ♦बिल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है। ♦अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे। ♦नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा। ♦संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे। ♦आक की जड़ :...

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