गया जी की संगीत साधना।
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इतिहास के पन्नों में पढ़ा था कि जब यदुकुल नंदन कृष्ण के मुरली की तान फिजां में तैरती थी तब जंगल में विचरण करती गौयें और मृगियों के झुंड दौड़े चले आते थे।जब मियाँ तानसेन दीपक राग का आलाप लेते थे तो बुझे हुये दीप अपने आप जल जाते थे,जब बेमौसम भी मेघ मल्हार की तान छेड़ते थे तो शून्याकाश में काले काले मेघों के साथ झमाझम वर्षा की बूँदें मौसम को खुशमिजाज बना देती थीं।इतिहास के पन्नों की ये बात इति माने बिती और हास माने महज कहानी सा प्रतीत होता था।किन्तु जब विगत दिनों बोधगया की पावन धरती पर आयोजित गया जी की आध्यात्मिक और सांगीतिक साधना पर संपन्न हुये सेमिनार में मंचस्थ विद्वानों से यह जाना कि इस पावन गयाजी की गोद में ऐसे लाल खेले हैं जिन्होंने अपनी साधना के दम पर मेघ मल्हार की तान पर बेमौसम आकाश को कृष्ण वर्णीय मेघाच्छन्न कर बरसने पर मजबूर किया है।सुनकर मुझे इतिहास के पन्नों की बातों के सिर्फ कहानी मानने पर बहुत अफ़सोस हुआ।अपने आप पर क्रोध आया ,उस महान साधक के बहुत निकट रहकर भी आखिर मैंने आजतक इस सत्त्य से अपने आपको महरूम क्यों रख्खा।आज उस महात्मा के प्रति एक बार पुनः श्रद्धांजलि के चंद शब्दपुष्प समर्पित करते नयन के कोर अश्रुपूरित हो रहे हैं जो विगत दो सप्ताह पूर्व हमसे सदासर्वदा के लिये अलविदा हो गये"पं.गोवर्द्धन मिश्र"।श्री मिश्र के ही समकालीनों में एक नाम बड़े आदर और श्रद्धा के साथ लेना नहीं भूलूंगा जिनके आशीर्वाद बराबर मुझे आत्मीय भाव से प्राप्त होते रहे,जिनके शिष्य पं. राजन सिजुआर आज भी गयाजी के ठुमरी,दादरा,कजरी,ध्रुपद,धमार ,खयाल के साथ साथ उपशास्त्रीय विधाओं के गायन साधना रत्त रहकर राष्ट्रीय स्तर पर अपने गयाजी को ख्याति लब्ध कर रहे हैं।ऐसे तपःपूत साधक समृतिशेष पं.कामेश्वर पाठक को भी कोटिशः नमन करता हूँ।
अंतःसलिला के पावन तट पर सुरसलिला की धार का प्रस्फुटन जो शदियों पूर्व हुआ वह आज भी इस विष्णुधाम को अपनी साधना से सिंचित कर रहा है।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐@पद्मनाभ*******
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