Skip to main content

बुद्ध अनीश्वर वादी नहीं।

बुद्ध अनीश्वरवादी नहीं।
💐💐🎂🎂💐💐
भारतीय दर्शन का फलक बड़ा ही व्यापक है।हम सहज भाव में इसपर मतैक्य नहीं हो पाते।ऐसे में मतभिन्नता स्वाभाविक है।बुद्ध का प्राकट्य नवीन विचारों के साथ होता है।वे प्राचीन अवधारणाओं से इतर नवीन अवधारणाओं को लेकर जनसामान्य के बीच आते हैं।ऐसे में पुराणपंथियों के मन में अकुलाहट स्वाभाविक है।भीड़ से इतर ,प्रचलन से परे जब आप चलेंगे तो जनसामान्य का मस्तिष्क प्रश्नजनित होगा ही।जिज्ञासायें जन्म लेंगी ही।किन्तु थोड़ा ठहर कर यदि विचार किया जाय तो तमाम जिज्ञासायें शांत होकर आनंददायी होंगी।धरातल पर रहिये ,सत्य के व्यापक फलक पर थोड़ा ध्यानस्थ होईये ,समाधान सरल और सार्थक होगा।ईश्वर संबंधी प्रश्नों पर तथागत सदैव मौन साधे प्रतीत होते हैं।शायद इसी आधार पर उन्हें अनीश्वरवादी मान लिया गया।यह गलत है।इस मौन के अनेक कारण हो सकते हैं।जब कारण हैं तो निवारण भी संभव है।ईश्वर अभिव्यक्ति का नहीं अपितु अनुभूति का विषय है।
हम ईश्वर को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकते।"जिन ढूँढा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ"।
"यो यथा माम् प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम्"।ईश्वर अंश जीव अविनाशी"।फिर शब्दों में ईश्वर की अभिव्यक्ति संभव प्रतीत नहीं होती।वह तो निराकार है।किसी निश्चित आकार की छवि भला हम कैसे बना सकते हैं। चार अंधों ने मिलकर एक हाँथी का निश्चित स्लरूप निर्धारित किया क्या?नहीं न।फिर हम ईश्वर के किसी निश्चित स्वरूप की कल्पना कैसे कर सकते हैं।यदि नहीं तो बुद्ध का इस संबंध में मौन होना बिल्कुल प्रासंगिक है।महात्मा बुद्ध को अनीश्वरवादी कहना कतई युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता।वे तो पूर्ण ईश्वरवादी हैं।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
💐💐💐💐💐बोधिदिवस की शुमकामनायें💐💐🎂🎂🎂🎂🎂🎂💐💐
                   💐💐💐@पद्मनाभ💐💐💐

Comments

Popular posts from this blog

रावण का काम तमाम।

रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

टोटके।

*🥦तांत्रोत्क वनस्पति टोटके🥦* 🕉️🏹🚩🔔🐚📿🔱 छोटे-छोटे उपाय हर unघर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं।हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है। यहां कुछ ऐसे ही सहज और सरल उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है, जिन्हें अपना कर पाठकगण लाभ उठा सकते हैं। ♦बिल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है। ♦अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे। ♦नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा। ♦संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे। ♦आक की जड़ :...

कैसे उसे बुलाऊँ मैं

नयनो से हैं रूठी नीदें सपन कहाँ सजाऊँ मैं। दूर हो गइ रूह जिगर से वापस  कैसे  लाऊँ  मैं। सूख गये आँसू आँखों के कैसे  धार   बहाऊँ   मैं। सुनने वाला पास नहीं जब हालेदिल किसे सुनाऊँ मैं। बाती है पर स्नेह नहीं जब फिर कैसे दीप जलाऊँ मैं। रिसते हों जब जख्म ह्रदय में मरहम   कहाँ  लगाऊँ   मैं। हार गया हूँ तनहा रहकर कैसे   उसे   बुलाऊँ   मैं। फूलों की खुशबु जब आती दिल  को  कहाँ  सजाऊँ  मैं। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"