बुद्ध अनीश्वरवादी नहीं।
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भारतीय दर्शन का फलक बड़ा ही व्यापक है।हम सहज भाव में इसपर मतैक्य नहीं हो पाते।ऐसे में मतभिन्नता स्वाभाविक है।बुद्ध का प्राकट्य नवीन विचारों के साथ होता है।वे प्राचीन अवधारणाओं से इतर नवीन अवधारणाओं को लेकर जनसामान्य के बीच आते हैं।ऐसे में पुराणपंथियों के मन में अकुलाहट स्वाभाविक है।भीड़ से इतर ,प्रचलन से परे जब आप चलेंगे तो जनसामान्य का मस्तिष्क प्रश्नजनित होगा ही।जिज्ञासायें जन्म लेंगी ही।किन्तु थोड़ा ठहर कर यदि विचार किया जाय तो तमाम जिज्ञासायें शांत होकर आनंददायी होंगी।धरातल पर रहिये ,सत्य के व्यापक फलक पर थोड़ा ध्यानस्थ होईये ,समाधान सरल और सार्थक होगा।ईश्वर संबंधी प्रश्नों पर तथागत सदैव मौन साधे प्रतीत होते हैं।शायद इसी आधार पर उन्हें अनीश्वरवादी मान लिया गया।यह गलत है।इस मौन के अनेक कारण हो सकते हैं।जब कारण हैं तो निवारण भी संभव है।ईश्वर अभिव्यक्ति का नहीं अपितु अनुभूति का विषय है।
हम ईश्वर को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकते।"जिन ढूँढा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ"।
"यो यथा माम् प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम्"।ईश्वर अंश जीव अविनाशी"।फिर शब्दों में ईश्वर की अभिव्यक्ति संभव प्रतीत नहीं होती।वह तो निराकार है।किसी निश्चित आकार की छवि भला हम कैसे बना सकते हैं। चार अंधों ने मिलकर एक हाँथी का निश्चित स्लरूप निर्धारित किया क्या?नहीं न।फिर हम ईश्वर के किसी निश्चित स्वरूप की कल्पना कैसे कर सकते हैं।यदि नहीं तो बुद्ध का इस संबंध में मौन होना बिल्कुल प्रासंगिक है।महात्मा बुद्ध को अनीश्वरवादी कहना कतई युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता।वे तो पूर्ण ईश्वरवादी हैं।
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💐💐💐💐💐बोधिदिवस की शुमकामनायें💐💐🎂🎂🎂🎂🎂🎂💐💐
💐💐💐@पद्मनाभ💐💐💐
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