मौत के तो अनेक
सौदागर मिल जायेंगे
पर जीवन तो बस
माँ की ही कोख में पायेंगे
जाते समय जग से
छोड़ने को मशान तक
चार जन साथ जायेंगे
पर आने को दुनिया में
अकेले माँ की ही
गोद को पायेंगे
सत्यनारायण कथा का
प्रथम अध्याय
माँ ही सिखलायेगी
सप्तम अध्याय का अर्थ
जीवन संगिनी बतायेगी
बाकी के अध्याय पाँच
सिखलायेंगे स्वतः साँच
गर समझ गये तो
आयेगी न कभी आँच
इसी लिये करो अर्चना
उसकी
जिसने की सर्जना जग की
वंदन करो अभिनंदन करो
मातृ चरण रज का सदा तुम
माथे तिलक चंदन करो
पा स्नेह परम पावन आँचल का
नंद नंदन ब्रज भूषण बनो
विश्व मातृ चरणाभ्याम् नमः
........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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