हम जो देखते हैं
परखते हैं
महसूस करते
नित्य
चतुर्दिक बदलते
परिवेश को
उकेर देते हैं
यथावत्
वैसे का वैसा
सरल सहज
भाव लिये
नहीं आता हमें
उलझाना
शब्दों के भँवर जाल में
छंद
अलंकार
रस
या अन्य
साहित्यिक
व्याल में
तो आइए सुनाते हैं
दास्तान आज की ताजा
हम
गये थे मंदिर
माँ मंगला के दरबार
फूल प्रसाद के
साथ खरीदा पूरा नारियल
इस बार
पहले हटाई जट्टा
फिर पटक कर फोड़ दिया
खोपड़ा नारियल का
बह गया पानी
रह गई साफ सुथरी
मुलायम नारियल की गिरी
मन झूम उठा देखकर
चित्त प्रसन्न हो गया
लगा साक्षात् माँ मंगला
मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही हैं
क्यों नहीं
यही तो प्रक्रिया है
आराध्य के साक्षात्कार की
पहले हटाओ जटा इच्छाओं की
फिर मिटाओ अहंकार खोपड़ी को
फोड़कर
बह जायेंगे नकारात्मक
विचार स्वतः
नारियल के पानी की तरह
देगी माँ दर्शन तब
कोमल मुलायम स्वच्छ
नारियल गिरि के रूप में।।
💐💐💐💐💐💐@पद्मनाभ*************
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