बागी
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जो मैं कहता हूँ सुनो
जो मैं कहता हूँ करो
जिसे मैं कहता हूँ धरो
जिसे मैं कहता हूँ पकड़ो
मैंने कहा छोड़ दो तो छोड़ो
जितना कहता हूँ उतना बोलो
जिसका कहता हूँ राज खोलो
नहीं सुनोगे मेरी तुम तो मैं चला
क्या कर लोगे मेरा तुम भला
मैं विद्वान हूँ बुद्धि सिर्फ मेरे पास है
विद्यावान भले नहीं कुटिलता तो खास है
मैंने पहले ही कहा था नहीं सुनोगे तो तोड़ दूंगा
अपने जैसे दस बीस को जोड़ लूंगा
तुम्हारी भावनाओं को मरोड़ दूंगा
राजनीति मैं करता हूँ तुम्हें आती कहाँ है
कुटिल स्वभाव मेरी तुम्हें भाती कहाँ है
स्वतः भाग जाओगे छोड़कर मैंदान
जब बार बार करेगा परेशान मेरा शैतान
कहलाओगे तुम फिर बागी
क्योंकि मेरी तो लगन स्वार्थियों से है लागी
तुम रोवोगे चिल्लाओगे शोर मचाओगे
फिर खाली हाथ वापस अपने घर को जाओगे
नहीं जानते कुल्हाड़ी को नहीं मानते
लकड़ी बिन लगे क्या वो पेड़ को हैं काटते
इतने के बाद भी क्या बुद्धि तेरी जागी
मैं हो गया बागी हाँ मैं तो हो गया बागी।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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