मैं !को मैं की तलाश
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मैं !मैं को ढूंढ रहा हूँ
मां की पवित्र कोख से जन्म लिया
पिता की गोद माता कीे आंचल मे पला
बेटा कहलाया ।
बहन ने प्यार दिया दुलारा झगड़े किया
भाई ने साथ खेला कुट्टि की फिर भी भाई ही
कहलाता रहा।
विद्यालय गया पढ़ाई की गुरु ने शिक्षा दी
मित्रों ने सहयोग किया हंसी ठिठोली की
शिष्य और मित्र बनकर रह गया।
बालपन खत्म ,किशोर बने
सुन्दर सुशील कन्या ने वरण किया
नई पहचान बनी पति की
कुछ दिनों बाद पत्नी ने अपने
प्यार का प्रतिफल पुत्र को कन्या को
जन्म दिया पिता बन गया मैं।
परिजनो के भरण पोषण के लिए
नौकरी ढूढना आरंभ किया
नौकरी मिली नौकर बनकर रह गया।
बच्चा बड़ा हुआ पढ़ाया लिखाया
उसकी शादी भी कर दी
उसके भी बच्चे दादा जी कहने लगे।
शरीर थका कमजोर हुआ बिना बताये
अचानक बीमारियों ने घेरा डाला
काल के दूत लेकर चले गये अपने साथ
पहले प्रेत फिर पितर मैं।
मैं !मैं को ढूढता ही रहा ढूढता ही रहा।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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