कंक्रीट के इन जंगलों को देखकर हैरान हूँ
रिश्तों के दरकते दरो दीवार से परेशान हूँ।
कितना सुहाना था मौसम वटवृक्ष की छांव में
जब रहा करता था कभी अपने गांव गिरांव में।
लोगों की बोली गिँल्ली डंडे संग हमजोली
बगल मे बोरी स्लेट किताब की लंबी सी झोली।
अमवां की डाली वो बागों का माली
चाचा के खेत से भुट्टा चुराना बाबा के मेड़ पर गन्ने चबाना।
स्कूल मे गुरुजी का खजूर का डंडा
दीदी जी का स्नेह भरा प्यार का फंडा।
न ड्रेस न टाई न बैज न बेल्ट की कमाई
पाठ याद नहीं करने पर होती धुनाई।
न जाति न धर्म नहीं जानते थे मजहब का मर्म
आदेश गुरु का सीख पिता की निभाना था कर्म।
दशहरा दिवाली हो होली या ईदबकरीद
मुहर्रम का तजिया हो थे हम सबके मुरीद।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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