कुर्बानी कुर्बानी............
गतांक से आगे...
हाँ तो मैं बात कर रहा था कुर्बानी या बली की।कुर्बानी या बली वस्तुतः एक ही पर्याय हैं।
हमारी सनातन परम्परा में बली और इस्लामिक परम्परा म़े कुर्बानी होता है।पर दोनो भाव मात्र समर्पण ही है।समर्पण सिर्फ और सिर्फ आत्मा का।दूसरे की नहीं अपनी आत्मा का ।अब आप कहेंगे यह कैसे संभव है?भला जब म़ै अपनी ही आत्मा का समर्पण कर दूँगा तो कुर्बानी कौन करेगा ?इसी को समझना ही तो असली कुर्बानी है मेरे भाई जान।जिस दिन हमने इसको समझ कर आत्मसात कर लिया अल्लाह हमारी कुर्बानी कुबूल कर हमारी सारी मुरादें पूरी कर देगा।अब आप यह समझें कि आत्मबली कैसे देंगे ?अपनी आत्मा को अल्लाह के नजर कैसे कुर्बान करेंगे?
बड़ी आसान है इसे समझना और कर पाना।बस थोड़ा जी को कड़ा करना होगा।हिम्मत बाँधनी होगी ।क्योंकि आत्म हत्या करने जा रहे हैं आप।
अरे घबरा गये आत्महत्या की बात सुनकर।डर गये न।भला सोंचीये आप मरने से कितना डर लगता है।आप मरना नहीं चाहते अपने अल्लाह के लिये लेकिन एक निरीह प्राणी को मार देना चाहते हैं।कभी सोंचा वह कितना डरा सहमा रहता होगा जब आप उसकी गर्दन रेत रहे होते होंगे।कुर्बानी आत्म समर्पण है।किसी दूसरे का समर्पण नहीं।समर्पण का मतलब कतई किसी का या अपनी आत्मा का वध नहीं।समर्पण अपनी आत्मा में समाहित कुविचारों का,अपनी दुर्नीतियों,अपनी बुराइयों का,अपनी कुसंगति का,अपनी अहंकारिता का,अपने बड़प्पन भाव का,अपनी आसक्ति का ,अपनी अकर्मन्यता का,और अपने कुभाव का।यही सच्ची कुर्बानी है।यही बली है।इसी को अल्लाह कुबूल फर्माता है।यदि आपने ऐसा नहीं किया तो खुदाकसम अल्लाह त आला कभी आपको मुआफी नहीं देगा।आपको जन्नत की जगह दोजख ही नसीब होगा।कभी स्वर्ग की कामना पूरी नहीं होगी।नारकीय जीवन ही मिलेगा।और यदि आपके धर्मग्ंथ आपको ऐसा आदेश देते है,आपके ऋषि या पैगम्बर ऐसा आदेश देते हैं तो बेशक आप उसका अनुपालन करें ।किसकी हिम्मत है जो आपको रोक दे।
💐💐बकरीद मुबारक💐💐
***मनोज***
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
Comments
Post a Comment