आनन्दकानने ह्यस्मिञ्जङ्गमस्तुलसीतरुः।
कवितामञ्जरी भाति रामभ्रमरभूषिता।।
श्री राम चरितमानस की महिमा का बखान करने के पूर्व महाकवी के मानस रचना के उपरांत समाज में फैली उनके प्रति भ्रांतियों पर दृष्टिपात करना आवश्यक हो जाता है।आज तुलसी साहित्य सर्वबोधगम्य सर्वसुलभ और सर्वकाल समीचीन प्रतीत हो रहा है।परन्तु जब तुलसी ने मानस की रचना की तो तथाकथित पंडितों ने इसे सिरे से नकारने की योजना पर कार्यारंभ कर दिया।प्रथम मूल प्रति को चौर कर्म के माध्यम से विनष्ट करने का प्रयास किया गया।किन्तु इसमें कामयाब न होने पर उन्हें मुँह की खानी पड़ी।महामना ने वह मूल प्रति मुगलिया दरबारी अपने मित्र टोडरमल के पास सुरक्षा हेतु स्थानापन्न कर दिया।पुनः इसकी दुसरी प्रति रच डाली।फिर कई प्रतियां हस्तलिखित तत्कालीन विद्वानों के अवलोकनार्थ समर्पित कीं।उन्हीं विद्वानों के बीच से श्री मधुसूदन सरस्वती ने गोस्वामी के मानस का शब्दशः,अर्थशः आद्योपांत अध्ययनोपरांत मानस की महानता को प्रदर्शित करते हुये अपने सुविचारों के प्रकटिकरण में स्पष्ट रूप से कहा कि "इस काशीरूपी आनंदवन में तुलसीदास चलंत तुलसीविरवा की तरह हैं।उनकी कविता मंजरी अत्यंत सौन्दर्य सौष्ठवपूर्ण है।इस पर राम रूपी भ्रमर सदैव मंडराया करता है।"
इतने पर भी पंडितों को चैन नहीं मिला ।आगे भी कई उपाय से मानस के साथ साथ महान साहित्यसाधक तुलसी को भी सदैव नीचा दिखाने का प्रयास जारी रखा।तब महामना ने उन्हें निरुत्तर करने के लिये इस श्लोक को माध्यम बनाया...............
नानापुराणनिगमागमसंमतम् यद्
रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा..
भाषानिबद्धमतिमंजुलमातनोति।।
अर्थात नाना प्रकार के शास्त्रों के अवलोकन अवगाहनोपरांत जो विचार मेरी निर्मल बुद्धि के द्वारा उत्पन्न हुये उसे मैं अपने आनंद के लिये भाषानिबद्ध कर रहा हूँ।इससे इतर और कोई भाव मेरे मानस पटल में नहीं हैं ।
धन्य हैँ ऐसे महान व्यक्तित्व के मनीषी जिनके इन्ही धवल विचारों ने आज स्वान्तःसुखाय मानस को परांतःसुखाय की संज्ञा प्रदान कर दी।
💐💐जय श्री राम💐💐
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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