इस्लाम धर्मावलंबी भाईयों का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है बकरीद।इस दिन सभी धर्मवलंबी भाई जान अपने अपने घरों में कुर्बानी देते हैं।पर शायद इन्हें इसका वास्तविक मतलब पता नहीं।कुर्बानी का अर्थ कतई किसी जीव की हत्या से नहीं है।इसका वास्तविक अर्थ समर्पण है,अपने प्रिय का। अल्लाह जो कि ईश्वर का ही पर्याय है ,को समर्पित करना।किन्तु होता है इसके विपरीत।हमारे सभी प्रिय हमारे पास ही रह जाते हैं और समर्पण एक निरीह प्राणी के मरे हुए शरीर का।क्योंकि आत्मा तो अमर है।वह मुक्त है।फिर उस मृत शरीर के समर्पण से जो कि निर्जीव है अल्लाह को प्रसन्नता क्योंकर होने लगी।कुर्बानी या बली दोनों के विषय में कुछ ऐसी ही मेरी मान्यता है।
इस संबंध में श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीये अध्याय का उन्नीसवाँ पुष्प द्रष्टव्य है........
तस्मादसक्तः सततं कार्यं
कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म
परमाप्नोति पूरुषः।।
अर्थात् कर्म मनुष्य को बाँधते नहीं प्रत्युत मानव आसक्ति से बँधा होता है।मनुष्य का पतन कर्मों के कारण नहीं अपितु कर्मों में आसक्ति के कारण होता है।यदि आसक्ति रहित होकर परोपकार के निमित्त हम कर्म करें तो इस भवसागर से मुक्त हो परमतत्व को प्राप्त कर सकते हैं।कर्म हमें परिश्रम की ओर उन्मुख करता है और कर्मयोग वैश्रम्य प्रदान करता है।अतः हमें कर्म की ओर ध्यानस्थ होना चाहिये न कि विश्राम से नेह करना चाहिए।कर्मयोग हमें परहित की ओर प्रेरित करता है वहीं विश्रामयोग स्वार्थ का प्रेरक है।
अतेव श्री कृष्ण की यह वाणी यह बतलाती है कि अगर कुर्बानी देनी ही है तो हमें अपने अकर्मण्यता या आसक्ति की कुर्बानी या बली देनी चाहये।ये हमारे लिये सबसे प्रिये होते हैं।हम कुछ श्रम किये बिना सबकुछ पा लें।यही अकर्मण्यता है और इस भाव को स्वीकार कर लेना ,अपने आप में आत्मसात कर लेना ही आसक्ति है।आज इस कुर्बानी के पावन त्यौहार पर यदि हमारे इस्लाम धर्मावलंबी बंधुगण इसे स्वीकार कर तदनुरूप आचरण करते हैँ तो उन्हें मुबारकबाद स्वीकार करने का अवश्य हक बनता है।
🎂🎂बकरीद मुबारक🎂🎂
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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