जस जस सुरसा बदन बढ़ावा
तासु दून कपि रूप दिखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हां
अति लघुरूप पवनसुत लिन्हा।।
बदन पैठ पुनि बाहर आवा
मांगा विदा ताहि सिर नावा।।
मैं बहुत तरह की समस्याओं से घिरा हूँ ,कुछ समझ नहीं आता क्या करूँ, कैसे इससे निजात पाऊँ।मन बड़ा बेचैन रहता है।एक समस्या समाप्त नहीं होती कि दूसरी आ जाती है।पढ़ने में मन नहीं लगता,पढ़ाई पूरी कर ली नौकरी नहीं मिल रही,नौकरी मिल गई अब मन पसंद विवाह नहीं हो पा रहा है,शादी भी हुई कुछ दिनों के बाद बच्चे भी हो गये।माता पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा,पत्नी भी चिड़चिड़ी हो गई है,दिनरात घर में कलह का वातावरण बना रहता है।नौकरी में भी परेशानी है ,साहेब से पट नहीं रहा है।बच्चे बड़े हो गये हैं।बच्चों की अच्छी शिक्षा का प्रबंध नहीं हो पा रहा है।आमदनी उतनी है नहीं खर्च की सीमा बढ़ती जा रही है।बेटी भी बड़ी हो गई है कोई बढ़िया सा रिश्ता ढूढ रहा हूँ।जहाँ जाता हूँ इतना ज्यादा दहेज का मांग होता है कि दिमाग खराब हो जाता है।कुछ दिमाग काम नहीं करता क्या करूँ कैसे करूँ।एक समस्या से उबर नहीं रहा कि दूसरी आ मुँह बाये सामने खड़ी दिखती है।
ये सिर्फ मेरी नहीं तमाम जनमानस की समस्याएं हैँ जिनसे हम़े नित्य जूझना पड़ता है।हम अपने आपको निरीह मान हाँथ पर हाँथ रख या माथे पर हाँथ धर चुपचाप सोंचते रहते हैं परेशानी झेलते रहते हैं।कभी कभी अधिक परेशानी के आलम में या तो घर छोड़कर चल देते हैँ या फिर आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध भी करने पर मजबूर हो जाते हैं।
आखिर क्यूँ?क्योंकि हमने अपनी तमाम समस्याओं को स्वयम् ही जन्म दिया है।इसके जनक हम खुद ही हैं।जब हम्हीं इसके जनक हैं तो इससे उबारेगा कौन?इसका हल भी हमें ही ढूँढना होगा।हनुमान की भाँति।समस्याएँ तो सुरसा हैं।अपना कद बढ़ाती ही रहेंगी।हम प्रतिस्पर्धा में इससे विजित कदापि नहीं हो सकते।ऐसे में बाबा तुलसी ने अपने मानस में बड़े ही सहज तरीके से उबरने का उपाय बता दिया यह कहते हुये कि............
"जस जस सुरसा बदन बढ़ावा
तासु दून कपि रूप दिखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हां
अति लघुरूप पवन सुत लीन्हा ं।।
बदन पैठ पुनि बाहर आवा
मांगा विदा ताहि सिर नावा।।
तो सोंच किस बात का।रास्ता तो बता दिया बाबा ने।अपने आपका लघ्वीकरण कर लो,अर्थात आवश्यकताओं पर नियंत्रण करो,प्रथम प्राथमिकता को ध्यानस्थ करो और सुरसा के मुँह से बाहर निकल पड़ो।
💐💐जय श्री राम💐💐
💐💐महामना अमर रहें💐💐
💐💐मनोज💐💐
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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