सासु ससुर गुर प्रिय परिवारु।
फिरहु त सब कर मिटै खभारु।।
तुलसी सप्ताह के अन्तर्गत महामना गोस्वामी तुलसीदास जी के विचार उन सौभाग्यवती स्त्रियों के लिये जिनके पति कहीं अन्यत्र जा रहे हों या लंबे समय कहीं बाहर रहते हों के संबंध में। सनातनी परम्परा के दिव्य ग्रंथ श्री रामचरित मानस के अयोध्याकांड में दशरथ नंदन श्री राम के वन गमन प्रसंग में श्री राम के द्वारा जब पितुराज्ञा पालन हेतु वनगमन की तैयारी हो रही है उसी समय जनक नन्दिनी अपनी धर्मपत्नी सीता को यह समझाने का तथा सास ससुर के प्रति बहु के कर्तव्य का बोध करवाते हुये राम कहते हैं ................
पितु संदेश सुनि कृपानिधाना।
सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारु।
फिरहु त सब कर मिटै खभारु।।
अर्थात हे सीते अब तो मैं पुज्य पिता के आज्ञा पालन हेतु वनगमन कर रहा हूँ।ऐसे में आपका मेरे वियोग में व्यर्थ समय व्यतीत करना उचित नहीं।अब मेरी अनुपस्थिति में इन परिजनों के प्रति आपका दायित्व बढ़ जाता है।आप अपनी सास और ससूर के साथ ही अन्य गुरुजनों एवं परिजनों के प्रति पूर्ण निष्ठा का भाव मन में रखकर इनकी सेवा संभार करेंगी।इससे आपके अंदर मेरे वियोग से उत्पन्न कष्टों का शमन होगा।
इस प्रसंग के माध्यम से बाबा तुलसी ने समग्र स्त्री वर्ग को अपने ससुराल के प्रति मन में श्रद्धा का भाव जगाने का सफल कार्य किया है।उन्होंने स्पष्ट तौर पर स्त्रियों को पति की अनुपस्थिति में विशेष तौर से उनके कर्तव्य का बोध कराया है।आज समाज में मानस का अवगाहन ,मनन,चिंतन ,श्रवण न के बराबर रह गया है।यह परम पावनता का प्रतीक बन सिर्फ पूजा की सामग्री बनता जा रहा है।आधुनिकता के व्यामोह में हम जीवन को सँवारनेवाले इन सद्ग्रंथों से अपने आपको अलग करते चले जा रहे हैं, परिणाम भी सामने प्रत्यक्ष दीख रहा है।हर घर देखा एके लेखा कहकर हम इतिश्री कर लेने को बाध्य होते हैं।फिर भी कभी अपनी बेटियों को ऐसे सुविचारों से अवगत कराने का प्रयास नहीं करते।और तो और यहाँ तक कहने से बाज नहीं आते कि अभी से रामायण और गीता पढ़कर क्या करेगी।समय आयेगा तो सब पढ़ लेगी।यह नहीं सोचते कि वह समय कभी आयेगा ही नहीं।जो समय आज है वह कल कभी लौटकर आनेवाला नहीं है।हमारे शास्त्र उपदेशित करते हैं कि ...............
लालयेत् पंचवर्षाणि दसवर्षाणि ताड़येत्।
प्राप्ते तु षोडसे वर्षे पुत्र मित्रवदाचरेत्।।
पाँच वर्ष की उम्र तक बच्चे का लाड़ प्यार के साथ पोषण ,पाँच से दस वर्ष तक उसकी मनोवृत्ति को समझना ,दस से सोलह वर्ष तक उसकी मनोवृत्ति का अध्ययन करते हुये शिक्षा के माध्यम से ज्ञान प्राप्ति को उन्मुख करना पुनः सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त होते ही उसके साथ मैत्रीभावपूर्ण व्यवहार करना।कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी संतान के प्रति जन्म से यौवनावस्था प्राप्ति पर्यंत हमें पूर्ण सजग रहकर उसे भावी जी्वन के लिये तैयार करना है।आज हमारे इसके विपरीत आचरण के कारण ही उपरोक्त घर घर देखा ...... की स्थिति उत्पन्न हो रही है।यदि समाज में व्याप्त वर्तमान विपरीत परिस्थितियों से हम छुटकारा पाना चाहते हैं तो अपने बच्चों को विशेषतः अपनी बेटियों को सुसंस्कत बनाना होगा।उन्हें मानस जैसे सद्ग्रंथों के प्रति आस्थावान बनाना होगा तभी हम पुनः अपनी पुरातन स्थिति में समाज को देख पाने में सक्षम होंगे।एक सभ्य ,सुसंकृत,संस्कारसंपन्न समाज गढ़ने में सफल हो पायेंगे।
💐💐महामना तुलसी को सादर
नमन निवेदित करते हुये
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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