ब्रह्मांड की अनंत शक्तियों के
अधिकारी होकर भी हम
अपनी आँखों पर अपनी ही
हाँथों से पर्दा कर लेते हैं फिर
रोते है चिल्लाते हैँ अंधकार को
कोसते है खोजते हैँ भगवान को
कहाँ?
कभी ह्रदय के भीतर झाँका क्या अपने
कभी जीवित प्राणी को देख पाये नहीं न
ढूंढते रह जाओगे पत्तथरों में
नहीं मिलेगा चिल्लाओगे मुर्गे की तरह छत पर
क्योंकि तुमने स्वयम् ही तुम्हें बनाया है
अपनी सोंच से।
कभी जिन्दगी को अपने दम पर
जीकर तो देखो
क्यों जीते हो दूसरे के भरोसे
उनके कंधे तो सिर्फ लाश ढोने के
काम आते हैँ
हाँ हम पागल हैं
क्योंकि लोग मुझे
पागल ,समझते हैं
कहने दो उन्हें
मेरे सीने में जख्म दफन है
उन्हें मैं
फूलों के गुलदस्ते की तरह
संवार कर सजाकर
रखता हूँ।
महापाप है
अन्याय और अपराध को सहना
मिथ्या संग समझौता भी महापाप है।
💐💐मनोज💐💐
Comments
Post a Comment