जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी
सोई नृप होहीं नरक अधिकारी।।
श्रावण शुक्ल सप्तमी आने वाली है।आज के ही दिन महामना गोस्वामी तुलसीदास का अवतरण दिवस मनाया जाता है।कुछेक विद्वान इस तिथि को ही इनका प्रयाण दिवस भी मानते हैँ।
श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी धरेयो शरीर।
या फिर..श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तजेयो शरीर।चाहे जो भी हो हमारी सनातन परंपरा के अनुसार अवतरण एवं प्रयाण दोनो ही दिवस को पुण्यप्रद माना गया है।वह भी विशेषतः महान आत्माओं के संदर्भ में।फिर तुलसी से महान् कौन सी आत्मा हो सकती है,जिसने अपने मानस मे राम के चरित को सर्वतोभावेन स्थापित कर स्वान्तःसुखाय प्राप्त आनंदानुभूती को परांतःसुखाय बना दिया।मानव जीवन से संबंधित कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका निराकरण रामचरित मानस में न हो।
जीवन की प्रारंभिक अवस्था बाल्यावस्था होती है।इस अवस्था में जो संस्कार के बीज हमारे भीतर बोये जाते हैं वही प्रस्फुटित होकर हमें मानव ही नहीं महामानव बनने तक की यात्रा में सहायक होते हैँ।तभी तो बाबा कहते हैं...... प्रातकाल उठ के रघुनाथा
मातु पिता गुरु नावहीं माथा।।
इतना अभ्यास करने के बाद जब ज्ञानार्जन के निमित्त गुरुआश्रम को गमन करते हैं तब इसका प्रत्यक्ष प्रभाव परिलक्षित होता है ।देखे़ कैसे.......
गुरु गृह गये पढ़न रघुराई
अल्पकाल विद्या सब पाई।।
छःशास्त्र चौंसठ कलाओं में निपुणता भला ऐसे थोड़े ही प्राप्त हो जाती है उसके लिए तो माता पिता एवं गुरुजनों का आशीष चाहिए ही।ईश्वर है या नहीं इसे अब तक किसी ने भी आधिकारिक तौर पर स्वीकृति नहीं दी है।सबलोग नेति नेति और चरैवेति चरैवेति ही कहते दीखते हैँ।परंतु माता पिता हैँ, सद्गुरु हैं और हैं तो फिर इनके ह्रदय तल से निकले आशीष यदि मिलँ जायें तो फिर जीवन की सारी मुराद पूरी।और जब इनके आशीर्वाद से मनोवांछित फल की प्राप्ति हो तो फिर यही तो प्रत्यक्ष देवता हुए न।फिर हम कैसे माने कि देवता नहीं हैँ?इसी प्रकार चाहे बालक हो ,युवा हो ,प्रौढ़ हो,वृद्ध हो,स्त्री हो,पुरुष हो,शासक हो,प्रशासक हो,अनुशासक हो सबके लिए बाबा ने बड़ी ही सहज भाव में जीने की कला बताई है।अब आप उसे नहीं अपनाते या अपनाकर भी आत्मसात नहीं करते तो बाबा दोषी थोड़े हैँ?अब देखिये न कितना सहज और सरल भाव में बाबा ने एक कुशल शासक को परिभाषित कर दिया.........
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी ,सोई नृप अवस नरक अधिकारी।।बाबा ने सिर्फ कहा ही नहीं करके दिखाया।प्रजा समूह के एक छोटे से सदस्य की नाराजगी पर मर्यादा पुरुषोत्तम राजा राम अपनी धर्मपत्नी सीता तक का त्याग कर देते हैं,क्योंकि राज्यारोहण काल में लिया गया संकल्प उन्हें स्मृत है.........
स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति में व्यथा।।
धन्य है वह शासक जो अपनी कुर्सी की परवाह न करते हुए लोकाराधन के निमित्त चौदह वर्षों का वनवास काटकर सत्ता संभालता है और अपनी प्राणप्यारी का वियोग सहन स्वीकार कर लेता है ।आज के सत्ता लोलुप शासक एक बार भी यदि इस पावन महामंत्र को पढ़ कर समझ लेते तो शायद आज के इस प्रजातांत्रिक युग में जहाँ जनता ही जनार्दन है ,इनके आशीर्वाद से कभी वंचित नहीं होना पड़ता।नरकगामी त्रासदी नहीं झेलना पड़ता।बात आस्तिकता की ,प्रेम और सद्भाव की ,सिद्धांत राम राज्य की स्थापना का और कर्म रावण राज्य से भी निकृष्ट।रावण ने देवी सीता का हरण किया था ,अपहरण नहीं।उन्हें सोने के महल में नहीं रखा ,वाटिका में रखा अशोक वृक्ष की छांव में।सुरक्षा घेरे में दास नहीं दासी राक्षसियाँ थीं।रावण स्वयम् अकेले कभी सीता से नहीं मिलने आता राक्षसियों का समूह हुआ करता था।उसने कभी सीता का मुखमंडल नहीं निहारा सदैव आँखें नीची करके बात की।वह विपुल बलशाली राक्षस था।चाहता तो सीता को बलात् अपनी पटरानी बना सकता था ।किन्तु उसे भी अपनी मर्यादा का भान था।
किन्तु आज शासक वर्ग ही जब अपनी मर्यादाओं को भूल रहा है तो फिर आम जन के अराजक होने में संदेह कैसा।?यथा राजा तथा प्रजा।।
जय श्री राम।
नमन् महामना को।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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