मैं राष्ट्रपति बनना चाहता हूँ।
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हाँ !
सच में
मैं राष्ट्रपति बनना चाहता हूँ।
आपको विश्वास नहीं होता
मेरी क्षमता पर
तो सुन लें जान लें आप
मेरी खूबियों को
समझ लें
परख लें
फिर आप को उचित लगे
तो
फैसला अवश्य करें
मैं
चिकनी चुपड़ी बातें
करने में माहिर हूँ
घर बैठे बैठे संसद को
उपदेशित करने में
जग जाहिर हूँ
अपने आपको हाँ
और आपको ना
कहने में संकोच नहीं
करता
बिन माँगे सलाह देने में
सोंच नहीं धरता
आपके विचारों की परवाह भी
मैं नहीं करता
अहं ब्रह्मास्मि का
ख्याल मुझे सदा रहता
झूठ को सच
और सच को झूठ
साबित करना बखूबी आता है
नहीं मेरा किसी से कोई नाता है
कुछ स्वार्थी अयोग्य बंदों को
मैंने अपने प्यार से सींचा है
इनके अतिरिक्त शेष सब मुझसे नीचा है
नित्य शास्त्र चर्चा में रहता हूँ संलग्न
भले कोई समझे या न समझे पर
अपने आप में मैं हूँ सर्वज्ञ
जीवन की अंतिम घड़ी है
हाँथों में थामी छड़ी है
आँखों पर लगा है चश्मा
शास्त्रों से देता हूँ उपमा
उम्र पार हूँ साठा
पर बन कर बैठा हूँ पाठा
गलित नख दंत हूँ
देखे जीवन में अनगिनत वसंत हूँ
हाथ में सोने का शेष बचा कंगन है
आओ विप्र ले लो इसे दान करने का मन है
पूरी कर दो मेरी अंतिम अभिलाषा
क्योंकि जाते जाते देखना चाहता हूँ
संसद का तमाशा।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

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