सरिता की तरह स्वच्छंद
बहना चाहता था मैं
सागर की गहराईयों को
नापना चाहता था मैं
पर तूने मुझे पहले
तालाब सा स्थिर कर दिया
अब तो आहर पोखर की नाईं
सावन के एक बूंद सा
प्यासा
उड़ते गर्द ही देखता हूँ
काले मेघ़ो को आसमान में
उमड़ता घुमड़ता देख
उम्मीदें तो जगती हैं
पर
उड़न छू हो जाती हैं
पूर्वी बयार की धार में
देखकर खेतों में फटी दरार
ह्रदय भी तार तार हो जाता है
फिर जगती है आश
अगले बरसात की
शायद फसल लहलहायेगी
जीवन में फिर से बहारें आयेंगी
हम मिलेंगे
बैठेंगे
गप्पें करेंगे ढेर सारी
गूंजेगा आँगन में
हँसी का ठहाका तन्वी
श्यामा की आगोश में
दाडिम सी रक्त स्वच्छ दंत पंक्तियाँ
पक्व बिम्बाधरोष्ठ के मध्य
मध्येक्षामा हिरणी सी चकित भाव लिये।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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