दोष किसका
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कुछ दिनो पूर्व
मैं भ्रमणार्थ
महानगर मुम्बई गया था
शानदार जानदार लहरदार
शानोशौकत से लकदक
शोभा ही निराली है जहाँ
दिन और रात का अंतर
नहीं समझ पाया
जुहु
विलेपार्ले
आधुनिक माल
से लेकर मैरिन ड्राइव
और और भी न जाने
बहुत कुछ
साथ में सिद्धि विनायक
महालक्ष्मी मंदिर के अलावे
लालबाग के बादशाह का दर्शन
लगे हाथों होटल ताज और
गेटवे आफ इन्डिया भी देख लिया
और कुछ देखने की
लालसा ने पहुंचा दिया
एक वृद्धाश्रम में
आधुनिक सभी सुविधाओं से
परिपूर्ण
फिर भी लगा कुछ अपूर्ण
सुन्दर सुगन्धित फूलों से
सजे बाग की एक बेंच पर
नजर गई
देखा दो वृद्धायें
बैठी आपस में मशगूल हैँ
कुछ चर्चा में
मैं भी कुछ जानने की चाहत लिये
उनके निकट गया
पूछा माता जी आपदोनों की
आपस में रिश्तेदारी है क्या?
दोनो ही चौकी बोली
तुम्हें कैसे मालूम
हाँ हम दोनो समधन हैं
मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ
पूछा
वो कैसे?
वे बोलीं बड़ी हुलसकर
अरे भाई इनकी बेटी मेरी बहु है
और मेरी बेटी का विवाह
भी इनके बेटे से ही हुआ है
अब बताओ हम समधन ही
हुए ना
मैं सोंच में डूब गया
तो फिर ऐसा कैसे
आखिर दोषी कौन ?
दोष किसका?
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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