आत्मचिंतन
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भोक्तारं यज्ञ तपसां सर्वलोक महेश्वरम्।
सुह्रदं सर्वभूतानाम् ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति।।
श्रीमद्भगवद्गीता के पाँचवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सांसार में जीवों के द्वारा संपादित सभी शुभाशुभ कर्मों का भोक्ता भी मैं ही हूँ अर्थात् जीव जो भी कर्म करता है शुभ या अशुभ मन से या बेमन से वह ईश्वर के निमित्त ही जाता है।हम यह सोंचते हैं कि मैंने पूजा पाठ या दान यज्ञ हवन आदि शुभ कर्म ईश्वर को समर्पित कर दिया ।यह उनके निमित्त किया।किन्तु ऐसा नहीं है।मेरे द्वारा जो भी अच्छा या बुरा कर्म किया जाता है वो सब ईश्वर को ही समर्पित होता है।ऐसा नहीं कि शुभ कर्मों के अतिरिक्त संपादित कर्म सिर्फ मेरे होते हैं।
यदि ऐसा विचार कर हम कर्मों का संपादन करें तो निश्चय ही परमशांति को प्राप्त किया जा सकता है।ईश्वर हमारे सुह्रद् हैं।वे तो परमेश्वर हैं अर्थात् ईश्वर के भी ईश्वर हैं।प्रेम या शत्रुता,सुकर्म या दुष््कर्म सब के साक्षी वही हैं।
मानस म़े भी गोस्वामी जी ने लिखा है "ईश्वर अंश जीव अविनाशी"अर्थात जीव भी ईश्वर का ही अंश है।इसलिए यह मान लेना कि मैं तो अकेले म़े यह कार्य कर रहा हूँ।बंद कमरे म़े या सुनसान जगह पर कर रहा हूँ।मुझे कोई नहीं देख रहा है।कोई नहीं जान पायेगा।बिल्कुल हमारी भूल है।हम अज्ञानता के वशीभूत हो ऐसा सोंचते हैं।सत्य यह है कि वहाँ उस निर्जन बियावान में भी मैं होता हूँ।और फिर मैं जब जीव हूँ तो उसी ईश्वर का अंश हूँ।अर्थात ईश्वर रूप मैं स्वयम् उस कृत्य का भोक्ता बनता हूँ, अर्थात मेरे रूप में स्वयम् ईश्वर वहाँ भी विद्यमान है।मैं उसके प्रतिफल से मुक्त नहीं हो सकता।
श्री कृष्णार्पणमस्तु।
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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