साहित्य नहीं मैं पढ़ता हूँ
नित नये विचार पर गढ़ता हूँ।
ऊंची चाहे जितनी भी हो
नित नई इमारत चढ़ता हूँ।
जो कुछ भी पाता घर बाहर
लाता हूँ झोली भर भर कर।
स्वादिष्ट लगे जो रसना को
चट पट चट कर जाता हूँ।
भूख भले मिटती ना हो
पर मन तो तृप्ति पाता है।
तन बन जाए दधीचि भले ही
मानस को शान्ति दिलाता हूँ।
कथनी करनी का भेद नहीं
मैं समझ कभी भी पाता हूँ।
जो जी मे आता जाता है
बस कलमबंद कर जाता हूँ।
💐💐मनोज💐💐
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