दस दरवाजे
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कल मेरे एक मित्र ने कहा चलो नया मकान लिया हूँ, चलकर देख लो।मित्र मित्र होता है भले ही उसका कथन विचित्र होता है।मैं साथ मे चल पड़ा ।मन मे उत्साह और उमंग था।मित्र के नये मकान को देखने का।लो आ गया।यही तो है मेरा नया मकान,दरवाजे को खोलता अंदर आने का आमंत्रण देता वह मकान के अंदर प्रवेश कर गया।मैं दरवाजे पर ही खड़ा उस मकान को निहारता अपने विचारों मे खोया था कि अचानक मित्र ने मेरी तंद्रा यह कहते हुए भंग की ,अरे तू अभी तक यहीं खड़ा है ,आ चल अंदर चलकर बैठते हैं, गप्पें मारते हैं।
. क्या करता पीछे पीछे चल पड़ा।मकान केअंदर जाने पर उसने इसकी खूबियां गिनानी आरंभ कर दी।जानता है इस मकान मे पूरे दस दरवाजे हैं और खिड़कियां सिर्फ दो।लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता ये दो खिड़कियां ही पूरे मकान को रौशन कर देती हैं।दसो दरवाजे से होकर बड़ी अच्छी हवा पूरे घर कोआनंदमय बना देती है।मन को प्रसन्न कर देती है।
मैं चुप चाप उसकी बातों को सुन रहा था अब तक।पर अब मुझसे उसका झूठ सहन नहीं हो रहा था।मैने धीरे से उसके मुंह ऊंगली रख दी और कहा अब बस भी कर।तू किसे मूर्ख बना रहा है।मुझे!तुझे नहीं पता शायद यह मकान नया नहीं है,तू भले ही नया है।इस मकान को मैंने पहले भी देखा है ,पर तब तू नहीं कोई और था।शायद वह चला गया और अब तू यहाँ रहने आ गया।
💐💐💐मनोज💐💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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