अव्यंग्य को ही व्यंग्य बताऊंगा
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समाज अध्ययन की किताब मे मैंने
पढ़ा था,मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
वह,
ज्ञानी है ध्यानी है स्वाभिमानी है और
साथ साथ अभिमानी हैः
ज्ञान, अपने लिए
ध्यान दूसरों का
स्वाभिमान यदा कदा जब जागे
पर आभिमान सदा सर्वदा
लेखन का
वाचन का
प्रवाचन का
अवलोकन का
स्मरण का।
सुशब्द अपशब्द सब जायज
भले कोई नकारे वा सराहे।
हम जानते हैं
हर युग एक नई संस्कृति का प्रणेता रहा है।
इस युग में मैं यही सिखलाऊंगा
अपशब्दों की भाषा ही पढ़ाऊंगा।
चने की झाडं पर ही चढ़ाऊंगा
अव्यंग्य को ही व्यंग्य बताऊंगा।
तोड़ की भाषा मे ही जोड़
का तोड़ बताऊंगा
अनीती को ही नीति मान
समाज को उस पे चलाऊंगा।
साहित्य और संस्कृति छोड़
खोखले विचारों की धारा बहाऊंगा।।
💐💐🎂मनोज🎂💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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